
देश की पहली विधायी संस्था बनी केरल विधानसभा, जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया। कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन ने किया समर्थन, जबकि BJP के तीन में से दो विधायकों ने विरोध दर्ज कराया। प्रस्ताव में मतदाता सूची से कथित तौर पर बाहर किए गए पात्र मतदाताओं के अधिकार बहाल करने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया बदलने की मांग भी की गई।
तिरुवनंतपुरम | 13 अक्टूबर 2026
केरल विधानसभा ने 12 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया। इसके साथ ही केरल देश की पहली विधायी संस्था बन गई, जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग करते हुए औपचारिक प्रस्ताव अपनाया है। यह प्रस्ताव मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठाए गए सवालों के बीच लाया गया।
मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) और विपक्षी वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) ने इसका समर्थन किया। 140 सदस्यीय विधानसभा में UDF के 102 और LDF के 35 विधायक हैं। सदन में मौजूद BJP के तीन विधायकों में से दो ने प्रस्ताव का विरोध किया।
प्रस्ताव में कहा गया कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह उठने की स्थिति में संस्था की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। हालांकि, विधानसभा का प्रस्ताव अपने आप में CEC को पद से नहीं हटाता; इसमें केंद्र सरकार से आगे की कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है।
प्रस्ताव में क्या हैं तीन प्रमुख मांगें?
मुख्यमंत्री सतीशन ने प्रस्ताव के जरिए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के सामने तीन प्रमुख मांगें रखीं।
- मतदान का अधिकार बहाल करना: SIR के दौरान मतदाता सूची से गलत तरीके से बाहर किए गए सभी पात्र मतदाताओं के नाम वापस जोड़े जाएं।
- CEC को हटाने की प्रक्रिया शुरू करना: ज्ञानेश कुमार की निष्पक्षता पर उठे सवालों के मद्देनजर उन्हें पद से हटाने के लिए कदम उठाए जाएं।
- नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के चयन वाली समिति की संरचना बदली जाए, ताकि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हो सके।
सतीशन ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि मतदान का अधिकार लोकतंत्र की नींव है और किसी भी संस्था को नागरिकों के संवैधानिक अधिकार कमजोर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
उन्होंने कहा कि SIR में कथित अनियमितताओं को दूर करना और पात्र मतदाताओं के मतदान का अधिकार बहाल करना जरूरी है।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति में क्या बदलाव चाहता है केरल?
प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति के ढांचे पर भी सवाल उठाए गए हैं।
विधानसभा ने मांग की कि समिति में केंद्रीय गृह मंत्री की जगह भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल किया जाए। प्रस्तावित व्यवस्था में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की बात कही गई है।
प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि मौजूदा व्यवस्था में केंद्र सरकार का बहुमत होने के कारण चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता और चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता को लेकर संदेह पैदा होता है।
यह केरल विधानसभा की ओर से सुझाया गया बदलाव है। इसे मौजूदा नियुक्ति व्यवस्था में स्वतः लागू संशोधन नहीं माना जाना चाहिए।
SIR में अनियमितताओं को लेकर क्या आरोप लगाए गए?
प्रस्ताव में मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया को लेकर कई चिंताएं दर्ज की गईं। इनमें निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) की शक्तियां कम किए जाने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनाव आयोग के फैसलों पर अन्य चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्टों का उल्लेख किया गया।
प्रस्ताव में कहा गया कि यदि पात्र मतदाताओं को गलत तरीके से सूची से बाहर किया जाता है, तो इससे चुनाव प्रक्रिया और जनता के जनादेश की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, ये प्रस्ताव में दर्ज आरोप और चिंताएं हैं। इन्हें सभी मामलों में अनियमितता साबित होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
24 लाख मतदाताओं के नाम हटाने का मुद्दा भी उठा
विधानसभा में CPM के दो सदस्यों, साजी चेरियन और एम. विपिन ने प्रस्ताव में संशोधन की मांग की। वे केरल की मतदाता सूचियों से कथित तौर पर 24 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले में जवाबदेही तय करना चाहते थे। उन्होंने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी उठाई।
मुख्यमंत्री सतीशन ने उनके प्रस्तावित संशोधनों को स्वीकार नहीं किया। हालांकि, उन्होंने विपक्ष के नेता पिनराई विजयन के सुझाव को स्वीकार किया।
विजयन ने कहा था कि प्रस्ताव में केवल लाखों पात्र मतदाताओं को सूची से बाहर किए जाने का उल्लेख करने के बजाय देशभर के संदर्भ में करोड़ों मतदाताओं के बाहर किए जाने की बात कही जानी चाहिए।
इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि प्रस्ताव पर कांग्रेस और वामपंथी दलों ने साथ दिया, लेकिन मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आंकड़ों और जवाबदेही तय करने के तरीके को लेकर सदन में अलग-अलग सुझाव भी सामने आए।
BJP ने प्रस्ताव को बताया पाखंड
केरल BJP ने विधानसभा के फैसले की आलोचना की। पार्टी ने अपने एक्स अकाउंट पर कहा कि SIR प्रक्रिया के दौरान बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर गए थे और प्रस्ताव ईमानदारी से काम करने वाले लाखों BLO का अपमान है।
BJP के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने भी सतीशन के प्रस्ताव को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तब विधानसभा में इस तरह का प्रस्ताव पारित करना उचित नहीं है।
चंद्रशेखर ने यह भी आरोप लगाया कि केरल में SIR के जरिए फर्जी मतदाताओं के नाम हटाए जाने का समर्थन किया गया, जबकि दूसरे राज्यों में इसी प्रक्रिया का विरोध किया जा रहा है। उन्होंने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की भूमिका और राज्य सरकार में उनकी बाद की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाए।
BJP ने राज्य सरकार की अधूरी गारंटियों, बेरोजगारी, महंगाई और दूसरी समस्याओं का जिक्र करते हुए सतीशन के ‘ऐतिहासिक प्रस्ताव’ वाले दावे की आलोचना की। ये BJP के राजनीतिक आरोप हैं; इनका स्वतंत्र मूल्यांकन संबंधित नीतियों और आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
ज्ञानेश कुमार से जुड़े पुराने सतर्कता मामले की भी हो रही समीक्षा
प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब केरल सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े करीब दो दशक पुराने सतर्कता मामले की समीक्षा कर रही है। यह मामला उस समय का है, जब कुमार राज्य के लोक निर्माण विभाग के सचिव थे।
केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्नितला ने पिछले सप्ताह BBC News Hindi को बताया था कि उन्होंने मामले में कानूनी राय मांगी है। उनके मुताबिक, उन्हें बताया गया कि उस दौरान करीब 215 करोड़ रुपये की सड़क परियोजना में संज्ञेय अपराध हुआ था। उन्होंने सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को जांच के निर्देश देने की बात कही।
यह मामला 2006 में सामने आया था। उस समय विश्व बैंक की मदद से चल रही सड़क परियोजना पर काम कर रहे भारत-मलेशिया संयुक्त उपक्रम के मुख्य परियोजना प्रबंधक ली सी बीन की आत्महत्या के बाद भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए थे। उनके सुसाइड नोट में कथित तौर पर परियोजना में भ्रष्टाचार जारी रखने के लिए दबाव डाले जाने की बात कही गई थी।
इस मामले में ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर पुराने आरोपों और जांच की स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है। प्रस्ताव पारित होना या जांच की समीक्षा होना अपने आप में किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं है।
केरल विधानसभा के प्रस्ताव का आगे क्या होगा?
केरल विधानसभा का प्रस्ताव चुनाव आयोग की निष्पक्षता, SIR प्रक्रिया और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था पर राजनीतिक असहमति का औपचारिक दस्तावेज है। इसके जरिए राज्य सरकार ने केंद्र से कार्रवाई करने और चुनाव प्रक्रिया में सुधार की मांग की है।
लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया राज्य विधानसभा के प्रस्ताव से स्वतः पूरी नहीं होती। प्रस्ताव का वास्तविक संस्थागत प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि केंद्र सरकार इस मांग पर क्या कदम उठाती है और संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ती है।
फिलहाल यह घटनाक्रम SIR और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर जारी राजनीतिक बहस में एक नया अध्याय जोड़ता है। कांग्रेस और वामपंथी दल इसे मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा से जोड़ रहे हैं, जबकि BJP इसे राजनीतिक कदम बताते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव कर रही है।

