विरोध-प्रदर्शनों में नाराजगी सिर्फ चुनाव आयोग से या मोदी सरकार के रवैये से भी? युवाओं के आंदोलन पर विश्लेषकों की अलग-अलग राय

बेरोजगारी और परीक्षा व्यवस्था से लेकर SIR और मतदाता सूची तक, युवाओं के विरोध के मुद्दे हुए व्यापक। संजय कुमार के मुताबिक, मौजूदा नाराजगी मुख्य रूप से चुनाव आयोग को लेकर है, जबकि नीरजा चौधरी इसे नई पीढ़ी और संस्थाओं पर भरोसे से जुड़ा व्यापक सवाल मानती हैं। बीजेपी नेता गौरव वल्लभ का कहना है कि सरकार असहमति सुनती है, लेकिन विरोध के नाम पर अराजकता स्वीकार नहीं की जा सकती।

दिल्ली में पुलिस की मौजूदगी के बीच विरोध प्रदर्शन करते युवा और अन्य प्रदर्शनकारी
रोजगार, परीक्षा व्यवस्था और SIR को लेकर हो रहे प्रदर्शनों ने युवाओं के असंतोष और संस्थाओं पर भरोसे को लेकर बहस तेज की है।

नई दिल्ली | 13 अक्टूबर 2026

2026 में युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों का दायरा केवल नौकरी और परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहा। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर भी युवा समूह और विपक्षी दल सड़कों पर उतरे हैं।

इन आंदोलनों के बीच एक अहम सवाल उठ रहा है: क्या युवाओं की नाराजगी सिर्फ चुनाव आयोग से है, या यह केंद्र सरकार के कामकाज और संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसे से जुड़ा व्यापक असंतोष भी है? क्या रोजगार और परीक्षा में निष्पक्षता की मांग धीरे-धीरे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ रही है? या अलग-अलग मुद्दों पर हो रहे प्रदर्शनों को एक बड़े राजनीतिक आंदोलन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी?

इन्हीं सवालों पर कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ जर्नलिज्म मुकेश शर्मा ने राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार, बीजेपी नेता प्रोफेसर गौरव वल्लभ और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी से बातचीत की। तीनों ने युवाओं के असंतोष, सरकार की प्रतिक्रिया और इन आंदोलनों के संभावित प्रभाव पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखे।

रोजगार और बेरोजगारी: क्या युवाओं का असंतोष अचानक बढ़ा है?

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार के मुताबिक, युवाओं के सामने बेरोजगारी का सवाल नया नहीं है। पिछले तीन से साढ़े तीन दशकों से किए जा रहे सर्वेक्षणों में बेरोजगारी लगातार देश की प्रमुख समस्याओं में शामिल रही है।

उनका कहना है कि युवाओं के सामने रोजगार की समस्या पहले भी थी। इसलिए मौजूदा प्रदर्शनों को केवल अचानक पैदा हुए असंतोष के रूप में देखना सही नहीं होगा।

संजय कुमार के अनुसार, बदलाव इस बात में दिखाई देता है कि लोगों के बीच यह भावना बढ़ रही है कि सरकार उनकी समस्याओं को पर्याप्त गंभीरता से नहीं सुन रही। उनके मुताबिक, यही असंतोष अलग-अलग शहरों में विरोध प्रदर्शनों के रूप में सामने आ रहा है।

हालांकि, बेरोजगारी और चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए अलग-अलग आंदोलनों के प्रतिभागियों, उनकी मांगों और उनके कारणों को समझना जरूरी है। केवल एक ही समय में कई प्रदर्शन होने से यह साबित नहीं होता कि सभी के पीछे एक ही वजह है।

बीजेपी का पक्ष: सरकार असहमति सुनने के लिए तैयार

बीजेपी नेता और प्रोफेसर गौरव वल्लभ का तर्क इससे अलग है। उनका कहना है कि सरकार असहमति का स्वागत करती है और छात्रों की समस्याओं को सुनने के लिए तैयार रही है।

वल्लभ के मुताबिक, कुछ छात्र मुद्दे वास्तविक थे। सरकार ने उन्हें सुनने के बाद समाधान के लिए समिति गठित करने और समस्याओं पर काम करने का संकल्प लिया।

हालांकि, उन्होंने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि वे युवाओं की असहमति को अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं।

वल्लभ ने कहा कि युवाओं को अपनी समस्याएं उठाने का अधिकार है, लेकिन उन्हें ऐसे राजनीतिक तत्वों से भी सावधान रहना चाहिए जो देश की प्रगति में बाधा डालना चाहते हैं। उन्होंने कुछ विरोधियों के लिए ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल भी किया।

इस तरह बीजेपी का पक्ष है कि सरकार वास्तविक समस्याओं पर बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन विरोध के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक लामबंदी या अराजकता के लिए नहीं होना चाहिए।

मध्यम वर्ग में असंतोष: क्या बीजेपी के पारंपरिक समर्थन आधार में बदलाव हो रहा है?

राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी का मानना है कि मौजूदा घटनाक्रम को केवल चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी को लंबे समय से समर्थन देने वाले मध्यम वर्ग के एक हिस्से में भी असंतोष दिखाई दे रहा है।

चौधरी कहती हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से मध्यम वर्ग बीजेपी का महत्वपूर्ण समर्थक रहा है। नरेंद्र मोदी का राजनीतिक उदय भी एक बड़ी राजनीतिक परिघटना रहा है, लेकिन अब परिस्थितियों में बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं।

उनके अनुसार, मतदाता सूची से नाम हटने की आशंका गरीब परिवारों के लिए केवल मतदान के अधिकार का सवाल नहीं है। अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसका नाम मतदाता सूची से हट सकता है, तो उसके मन में यह चिंता भी पैदा हो सकती है कि वह अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार बदलने के लोकतांत्रिक विकल्प का इस्तेमाल कैसे करेगा।

चौधरी का तर्क है कि इस तरह की आशंका मतदान के अधिकार और कल्याणकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभों के बीच संबंध की भावना पैदा कर सकती है। हालांकि, मतदाता सूची से नाम हटने और किसी व्यक्ति के सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित होने के बीच स्वतः संबंध नहीं माना जा सकता। दोनों के लिए अलग-अलग पात्रता और कानूनी प्रक्रियाएं लागू होती हैं।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन रोकने की कार्रवाई पर क्या सवाल हैं?

10 अक्टूबर को दिल्ली में CJP और दूसरे संगठनों के प्रस्तावित प्रदर्शन के दौरान भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने, हिरासत में लेने और सार्वजनिक आवाजाही पर प्रतिबंधों को लेकर सवाल उठे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में भी प्रदर्शनकारियों की हिरासत और परिवहन सेवाओं पर लगी पाबंदियों से संबंधित मामले पहुंचे।

गौरव वल्लभ का कहना है कि हर युवा को अपनी असहमति व्यक्त करने और अपने मुद्दे उठाने का अधिकार है। लेकिन उनके मुताबिक, विरोध के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना या अराजकता फैलाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।

उन्होंने CJP के युवाओं से अपील की कि वे अपनी चिंताएं उठाते रहें, लेकिन ऐसे तत्वों को अपने मंच पर जगह न दें जिन्हें वे भारत-विरोधी मानते हैं।

वल्लभ ने SIR के मुद्दे पर कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और चुनाव आयोग राजनीतिक दलों की बात सुनने के लिए तैयार है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारी संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों का सवाल है कि यदि उन्हें अपनी मांगें उठाने के लिए किसी स्थान पर जाने से रोका जाता है, तो शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार व्यावहारिक रूप से कैसे इस्तेमाल किया जा सकेगा। इस बहस में दो अलग पहलू हैं—सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा।

क्या आंदोलन का दायरा विपक्षी दलों तक फैल रहा है?

नीरजा चौधरी के मुताबिक, शुरुआती प्रदर्शनों के बाद विपक्षी दलों की भागीदारी बढ़ी है। उनके अनुसार, राहुल गांधी और कांग्रेस के दूसरे नेताओं के सड़कों पर उतरने से आंदोलन को राजनीतिक समर्थन मिला है। आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों की भागीदारी ने भी इसका दायरा बढ़ाया है।

चौधरी का मानना है कि जब अलग-अलग राजनीतिक दल किसी आंदोलन से जुड़ते हैं, तो सरकार के सामने चुनौती केवल प्रदर्शनकारियों की मांगों तक सीमित नहीं रहती। उसे इस बात का भी सामना करना पड़ता है कि अलग-अलग दल इन मुद्दों को अपने राजनीतिक कार्यक्रमों में कैसे शामिल करते हैं।

लेकिन संजय कुमार इस घटनाक्रम के चुनावी असर को लेकर सावधानी बरतने की बात करते हैं। उनके मुताबिक, आंदोलन में शामिल होने वाले सभी लोग जरूरी नहीं कि चुनाव के समय उसी मुद्दे को अपनी प्राथमिकता बनाएं।

संजय कुमार कहते हैं कि जब उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों में चुनाव होंगे, तब राजनीतिक दलों का ध्यान चुनाव प्रचार और दूसरे स्थानीय मुद्दों पर भी जाएगा। मतदाता भी मतदान के समय रोजगार, महंगाई, कल्याणकारी योजनाओं, स्थानीय नेतृत्व और अन्य सवालों को ध्यान में रख सकते हैं।

इसलिए मौजूदा प्रदर्शन में भागीदारी को सीधे किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में भविष्य के मतदान का संकेत मानना उचित नहीं होगा।

क्या यह सरकार-विरोधी या व्यवस्था-विरोधी आंदोलन है?

इस सवाल पर संजय कुमार की राय स्पष्ट रूप से अलग है। उनके मुताबिक, मौजूदा विरोध को सीधे सरकार के कामकाज के खिलाफ व्यापक आंदोलन कहना सही नहीं होगा। वे कहते हैं कि उपलब्ध संकेतों में असंतोष मुख्य रूप से चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया को लेकर दिखाई देता है।

संजय कुमार के अनुसार, मूल सवाल यह है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया सही तरीके से हुई या नहीं। इसलिए इस आंदोलन की प्रमुख मांग चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची की विश्वसनीयता से जुड़ी है।

इसके विपरीत, नीरजा चौधरी मानती हैं कि नई पीढ़ी के प्रदर्शन का असर व्यापक हो सकता है। उनके मुताबिक, शिक्षित मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के युवाओं में सवाल उठाने और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

चौधरी CJP के युवाओं की मांगों को इसी संदर्भ में देखती हैं। उनका कहना है कि ये युवा अपने भविष्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और परीक्षा व्यवस्था को लेकर चिंतित हैं और अपनी आवाज उठाने के लिए हिरासत में लिए जाने का जोखिम उठाने की बात भी कर रहे हैं।

हालांकि, आंदोलन में अलग-अलग मुद्दों का एक साथ मौजूद होना यह साबित नहीं करता कि सभी प्रदर्शनकारी सरकार बदलने के उद्देश्य से सड़कों पर हैं। कुछ लोग चुनाव आयोग की प्रक्रिया से असहमत हो सकते हैं, कुछ रोजगार या परीक्षा व्यवस्था को लेकर नाराज हो सकते हैं और कुछ प्रदर्शन के अधिकार तथा पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठा सकते हैं।

क्या इन आंदोलनों का असर दूसरी संस्थाओं पर भी पड़ सकता है?

नीरजा चौधरी के मुताबिक, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन केवल सरकार तक सीमित असर नहीं डालते। जब लोग लगातार सवाल उठाते हैं, तो नौकरशाही, राजनीतिक दलों और न्यायपालिका सहित विभिन्न संस्थाओं को भी अपनी भूमिका और जवाबदेही पर विचार करना पड़ सकता है।

उनका कहना है कि CJP की मांगें शिक्षा, स्वास्थ्य और परीक्षा व्यवस्था में सुधार से जुड़ी हैं। फिलहाल इसे एक दबाव समूह के रूप में देखा जा सकता है, जिसके साथ अलग-अलग विपक्षी दल जुड़ रहे हैं।

चौधरी के मुताबिक, इन आंदोलनों का अंतिम परिणाम अभी बताना मुश्किल है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि मौजूदा प्रदर्शन लंबे समय तक एकजुट रहेंगे या अलग-अलग मुद्दों पर बंट जाएंगे।

लेकिन उनके अनुसार, युवाओं का अपनी समस्याओं को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इससे संस्थाओं के सामने यह सवाल आता है कि वे केवल नियमों का पालन सुनिश्चित करने के बजाय लोगों का भरोसा कैसे बनाए रखें।

आगे की चुनौती: नियमों के साथ भरोसा भी कायम रखना

मौजूदा विरोध प्रदर्शनों को समझने के लिए तीन पहलुओं को अलग-अलग देखना जरूरी है। पहला, बेरोजगारी, परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े युवाओं के सवाल। दूसरा, SIR और मतदाता सूची की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर उठ रहे सवाल। तीसरा, प्रदर्शनकारियों के साथ प्रशासन के व्यवहार और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जुड़ी बहस।

संजय कुमार का आकलन है कि फिलहाल नाराजगी का मुख्य केंद्र चुनाव आयोग है और इसे व्यापक सरकार-विरोधी आंदोलन मानने के लिए पर्याप्त आधार स्पष्ट नहीं है। गौरव वल्लभ का कहना है कि सरकार असहमति सुनने के लिए तैयार है, लेकिन विरोध के नाम पर अराजकता स्वीकार नहीं की जा सकती। नीरजा चौधरी इसके दायरे को व्यापक मानती हैं और युवाओं के बीच बढ़ती सवाल करने की प्रवृत्ति को महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखती हैं।

इन तीनों दृष्टिकोणों से एक बात स्पष्ट होती है: मौजूदा प्रदर्शनों को किसी एक कारण या एक राजनीतिक निष्कर्ष में समेटना उचित नहीं होगा। आंदोलन में शामिल लोगों की मांगों, उनकी भागीदारी और संस्थाओं के प्रति उनके भरोसे को अलग-अलग समझना जरूरी है।

सरकार और संबंधित संस्थाओं के सामने चुनौती केवल यह बताने की नहीं है कि नियमों के तहत क्या किया गया। उन्हें उठाए गए सवालों का जवाब देना, प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बनाए रखना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी जरूरी है। इसी से यह समझने में मदद मिलेगी कि मौजूदा असंतोष किसी एक मुद्दे तक सीमित है या संस्थाओं पर भरोसे को लेकर व्यापक चिंता का संकेत देता है।

Nagendra sahu
Nagendra sahu
नागेन्द्र साहू छत्तीसगढ़ के भिलाई से हैं। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक (BJMC) और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (MJ) की शिक्षा प्राप्त की है। पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वीडियो एडिटिंग ( Ex- भिलाई Times Sr Editor ) और डिजिटल कंटेंट में भी विशेषज्ञता के साथ वर्तमान में रेखांकित न्यूज़ का संचालन कर रहे हैं।
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