
राष्ट्रीय समाचार | चुनाव आयोग | मतदाता सूची पुनरीक्षण
दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कई अहम सवाल पूछे हैं। अदालत ने यह जानना चाहा कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज थे, लेकिन मसौदा सूची में शामिल नहीं रहे, उनसे पहली बार मतदाता बनने के लिए इस्तेमाल होने वाला फॉर्म-6 भरने को क्यों कहा जा रहा है। अदालत ने सुझाव दिया कि ऐसे मतदाताओं के मामलों को समझने के लिए सरल भाषा में जानकारी प्रकाशित की जाए और उनसे संपर्क करने की व्यवस्था की जाए।
रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मताधिकार महत्वपूर्ण है और मतदाता सूची से नाम हटने या छूटने के मामलों में प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की समय-सीमा बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है।
फॉर्म-6 और फॉर्म-8 में क्या अंतर है?
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि पहले से मतदाता सूची में दर्ज व्यक्ति को, जिसका नाम मसौदा सूची में नहीं है, नया मतदाता बनाने वाला फॉर्म-6 क्यों भरना चाहिए। सामान्यतः फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए किया जाता है, जबकि पता बदलने या मतदाता सूची में पहले से दर्ज विवरण में संशोधन जैसी स्थितियों में फॉर्म-8 प्रासंगिक होता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी मतदाता का पता बदल गया है, तो उसे नए पते के साथ संबंधित प्रक्रिया अपनाने का अवसर मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी चिंता जताई कि यदि किसी व्यक्ति को फॉर्म नहीं मिला या वह समय पर जवाब नहीं दे सका, तो उसके मताधिकार पर अनावश्यक असर नहीं पड़ना चाहिए।
SIR में कितने मतदाता मसौदा सूची से बाहर हुए?
प्रकाशित आंकड़ों और सुनवाई की रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली में SIR शुरू होने के समय मतदाताओं की संख्या करीब 1.45 करोड़ थी। इनमें से लगभग 97 लाख मतदाताओं के गणना फॉर्म जमा हुए, जबकि करीब 47 लाख मतदाताओं के फॉर्म जमा नहीं हो सके।
दिल्ली SIR के प्रमुख आंकड़े

इन आंकड़ों में वे लोग भी शामिल हो सकते हैं, जो पुराने पते पर नहीं मिले, काम के सिलसिले में बाहर थे या किसी अन्य कारण से गणना फॉर्म जमा नहीं कर पाए। इसलिए फॉर्म जमा नहीं होने को अपने आप में अपात्रता या स्थायी रूप से मतदाता सूची से बाहर होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को क्या सुझाव दिए?
अदालत ने चुनाव आयोग से कहा कि वह प्रभावित मतदाताओं तक खुद पहुंचने की व्यवस्था बनाए और केवल लोगों के आवेदन करने का इंतजार न करे। सुनवाई के दौरान सामने आए प्रमुख सुझावों में शामिल हैं:
- जिन मतदाताओं के नाम 2026 की सूची में थे, लेकिन गणना फॉर्म जमा नहीं हुआ, उन्हें फॉर्म जमा करने का एक और अवसर देना।
- पता बदलने वाले मतदाताओं के लिए फॉर्म-8 की प्रक्रिया स्पष्ट करना।
- मसौदा सूची से बाहर हुए मतदाताओं की सूची सरल भाषा में प्रकाशित करना।
- लोगों को उनके बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) या नजदीकी निर्वाचन अधिकारी से संपर्क करने के लिए जानकारी देना।
- दावे और आपत्तियां दर्ज करने की प्रक्रिया को अंतिम सूची प्रकाशित होने तक व्यावहारिक और सुलभ बनाए रखना।
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने अदालत को आश्वस्त किया कि सुझावों पर विचार किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर समय-सीमा बढ़ाई जाएगी।
30 अक्टूबर की समय-सीमा पर भी सवाल
अदालत ने यह भी पूछा कि जब दिल्ली में निकट भविष्य में चुनाव नहीं होने हैं, तो दावे और आपत्तियां दाखिल करने के लिए इतनी सख्त समय-सीमा पर जोर क्यों दिया जा रहा है।
29 अक्टूबर को प्रकाशित ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने चुनाव आयोग से कहा कि फिलहाल कटऑफ तारीख के आधार पर प्रक्रिया रोकने के बजाय फॉर्म स्वीकार करने की व्यवस्था जारी रखी जाए। आयोग ने समय बढ़ाने का आश्वासन भी दिया।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर अदालत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान मतदाता सूची में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति के आधार पर मतदाताओं को चिह्नित करने के तरीके पर भी चर्चा हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस श्रेणी की संवैधानिक वैधता पर उसने अभी अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
इसका अर्थ है कि पहले किसी अन्य मामले में SIR प्रक्रिया पर अदालत की टिप्पणी को दिल्ली में इस्तेमाल किए जा रहे हर मानदंड की मंजूरी नहीं माना जा सकता। संबंधित प्रक्रिया और उसके आधार की न्यायिक समीक्षा का प्रश्न अभी खुला है।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह प्रभावित मतदाताओं की सहायता के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दे। मामले की अगली सुनवाई लगभग दो सप्ताह बाद होने की बात कही गई है। इस बीच आयोग की ओर से समय-सीमा और फॉर्म स्वीकार करने की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए कदम महत्वपूर्ण होंगे।
इस पूरे मामले का मूल सवाल यही है कि मतदाता सूची को सटीक बनाने की प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम केवल इसलिए छूट न जाए कि वह पुराने पते पर नहीं मिला या समय पर गणना फॉर्म जमा नहीं कर पाया। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी दोहरी है—अपात्र और दोहराव वाली प्रविष्टियों को रोकना, साथ ही पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल होने का उचित अवसर देना।

