द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की जांच में दावा—98.5% फॉर्म-7 में नाम हटाने की वजह दर्ज नहीं; अधिकारियों ने कहा, सुनवाई के दौरान ERONET सिस्टम ने खुद तैयार किए फॉर्म, डिजिटल हस्ताक्षर भी अपने-आप जुड़े

नई दिल्ली/लखनऊ, 10 अक्टूबर 2026। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं। खोजी पत्रकारिता संस्था द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने 9 अक्टूबर को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के नाम हटाने से जुड़े 85,854 फॉर्म-7 ऐसे थे, जिनमें नाम हटाने का कोई कारण दर्ज नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक, ये फॉर्म चुनाव अधिकारियों ने सामान्य प्रक्रिया में खुद नहीं भरे, बल्कि मतदाताओं की SIR सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के ERONET सॉफ्टवेयर ने स्वतः तैयार किए। इन पर अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर भी दर्ज थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह मामला केवल तकनीकी गड़बड़ी तक सीमित नहीं है। इससे मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया, अधिकारियों की जवाबदेही और मतदाताओं के कानूनी अधिकारों को लेकर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, ये निष्कर्ष खोजी रिपोर्ट और उसके डेटा विश्लेषण पर आधारित हैं। चुनाव आयोग या उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से इस नई रिपोर्ट पर आधिकारिक प्रतिक्रिया प्रकाशित होने तक सामने नहीं आई थी।

87,127 अनुरोधों में से 85,854 में कारण नहीं
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के मुताबिक, उसकी टीम ने डेटा विश्लेषकों की मदद से उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर उपलब्ध फॉर्म-7 के आंकड़ों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में कुल 87,127 अनुरोधों का उल्लेख है, जिन्हें निर्वाचक रजिस्ट्रेशन अधिकारी (ERO) और सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रेशन अधिकारी (AERO) के स्तर पर दाखिल किया गया था।
इनमें से 85,854 अनुरोधों यानी लगभग 98.5 प्रतिशत में मतदाता का नाम हटाने की वजह दर्ज नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार, ये अनुरोध 15 मार्च से 2 अप्रैल 2026 के बीच दर्ज किए गए। इस तरह महज 19 दिनों में बड़ी संख्या में ऐसे फॉर्म सामने आए, जिनमें नाम हटाने के लिए आवश्यक कारण का उल्लेख नहीं था।
फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने के लिए आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। ऐसे मामलों में नाम हटाने की वजह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी आधार पर आपत्ति की जांच और संबंधित मतदाता को सुनवाई का अवसर देने जैसी प्रक्रियाएं आगे बढ़ती हैं।
नियमों के मुताबिक फॉर्म-7 में कारण देना जरूरी
फॉर्म-7 के जरिए किसी मतदाता का नाम हटाने पर आपत्ति दर्ज की जा सकती है। इसके लिए निर्धारित कारणों में से किसी एक का उल्लेख करना होता है। इनमें संबंधित व्यक्ति की मृत्यु, निर्धारित आयु से कम होना, अनुपस्थित होना या स्थायी रूप से स्थानांतरित हो जाना, मतदाता सूची में नाम पहले से दर्ज होना अथवा भारतीय नागरिक न होना जैसे आधार शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने वाले दावों और आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। जांच में यह भी सामने आया कि अधिकारियों की ओर से दाखिल 87,127 अनुरोधों में से 62 फॉर्म में केवल ‘A’, ‘N’, ‘H’ और ‘E’ जैसे अक्षर कारण के तौर पर दर्ज थे, जबकि 1,211 फॉर्म में ‘अनुपस्थित/स्थानांतरित’ लिखा गया था। रिपोर्ट का दावा है कि इन अनुरोधों में भी निर्धारित प्रक्रिया के पालन को लेकर सवाल हैं।
अधिकारियों ने कहा—सॉफ्टवेयर ने खुद तैयार किए फॉर्म
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने विधानसभा स्तर पर काम करने वाले चार निर्वाचक रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (ERO) से बातचीत के आधार पर बताया कि ये फॉर्म उन मतदाताओं से जुड़े थे, जिन्हें SIR के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ या ‘अनमैप्ड’ श्रेणी में चिह्नित किया गया था।
अधिकारियों के मुताबिक, सुनवाई के दौरान जब किसी मतदाता के दस्तावेजों या विवरण को मंजूरी नहीं दी जाती थी, तो ERONET सिस्टम स्वतः फॉर्म-7 तैयार कर देता था। चूंकि संबंधित अधिकारी अपने लॉग-इन क्रेडेंशियल से प्रक्रिया पूरी कर रहे थे, इसलिए फॉर्म पर उनके डिजिटल हस्ताक्षर भी दर्ज हो जाते थे। एक अधिकारी ने रिपोर्ट को बताया कि सिस्टम में फॉर्म तैयार होने के बाद उस पर उनका हस्ताक्षर होना तय था।
रिपोर्ट का दावा है कि सॉफ्टवेयर की इस प्रक्रिया के कारण अधिकारियों के सामने बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने से जुड़े फॉर्म पर हस्ताक्षर करने की स्थिति बन गई। इससे प्रक्रिया की पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने को लेकर सवाल उठे हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
रिपोर्ट में कहा गया है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की आपत्तियों पर निर्णय लेना निर्वाचक रजिस्ट्रेशन अधिकारियों की जिम्मेदारी है। लेकिन जिन मामलों में सॉफ्टवेयर ने उन्हीं अधिकारियों के नाम से फॉर्म-7 तैयार किए, वहां अधिकारी एक ओर नाम हटाने का अनुरोध दर्ज करने वाले और दूसरी ओर उस पर निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बन गए।
यह व्यवस्था निष्पक्ष सुनवाई और जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, SIR के दौरान चिह्नित मतदाताओं की सुनवाई के बाद नाम हटाने से संबंधित नोटिस और फॉर्म तैयार किए गए, जबकि सामान्य प्रक्रिया में आपत्ति दर्ज होने के बाद उस पर सुनवाई और निर्णय होना चाहिए।
तरबगंज और पीलीभीत में मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियों का पैटर्न
रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों का भी विश्लेषण किया गया है। इसके मुताबिक, इन दोनों क्षेत्रों में दर्ज नाम हटाने के अनुरोधों में करीब 90 प्रतिशत आपत्तियां मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ थीं।
तरबगंज में ‘रेशमा’ नाम से 188 आपत्तियां दर्ज होने का उल्लेख है। रिपोर्ट के मुताबिक, ये सभी आपत्तियां एक ही तारीख को दर्ज की गईं और एक ही बूथ के मतदाताओं के खिलाफ थीं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग के सार्वजनिक आंकड़ों में आपत्ति दर्ज कराने वाले लोगों की पहचान से जुड़ी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में इन आपत्तियों के पीछे किस व्यक्ति की भूमिका थी, इसकी स्वतंत्र रूप से जांच करना मुश्किल हो जाता है। यह आंकड़ा रिपोर्ट में दर्ज पैटर्न को दर्शाता है; अपने आप में इससे किसी व्यक्ति या संस्था की मंशा साबित नहीं होती।
समय-सीमा के बाद भी 1.10 लाख से ज्यादा अनुरोध स्वीकार किए जाने का दावा
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की जांच में एक और मुद्दा सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, 1,10,476 मतदाता-डिलीशन अनुरोध ऐसे थे, जिन्हें निर्धारित कानूनी समय-सीमा बीतने के बाद व्यक्तियों की ओर से दाखिल किया गया और चुनाव आयोग ने स्वीकार किया। रिपोर्ट का दावा है कि यह प्रक्रिया नाम हटाने से संबंधित लागू नियमों के अनुरूप नहीं थी। इस आंकड़े और इसके कानूनी निहितार्थ पर भी चुनाव आयोग की ओर से विस्तृत जवाब सामने आना बाकी है।
पहले भी 16.18 लाख आवेदनों का ब्योरा नहीं मिलने का मामला उठा था
इससे पहले 7 अक्टूबर को द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में 16.18 लाख आवेदनों से जुड़े विवरण सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं होने का दावा किया था। संस्था के अनुसार, उसने मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर उपलब्ध फॉर्म-6 के आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि सार्वजनिक किए गए आवेदनों तथा अंतिम मतदाता सूची में जोड़े गए नामों की संख्या में बड़ा अंतर था।
रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने पहले कहा था कि ये आवेदन ड्राफ्ट मतदाता सूची तैयार होने से पहले आयोग के निर्देशों के तहत जुटाए गए थे। कलेक्टिव ने इस स्पष्टीकरण पर भी सवाल उठाए और कहा कि इन आवेदनों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं मिला।
चुनाव आयोग और यूपी CEO से जवाब मांगा गया
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के अनुसार, उसने नई रिपोर्ट प्रकाशित करने से पहले उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा और दिल्ली स्थित भारत निर्वाचन आयोग को विस्तृत सवाल भेजे थे। लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक दोनों की ओर से जवाब नहीं मिला था।
इस मामले में अब सबसे अहम सवाल यह है कि ERONET सॉफ्टवेयर ने किन परिस्थितियों में अधिकारियों के नाम से फॉर्म-7 तैयार किए, निर्धारित कारण दर्ज किए बिना ऐसे फॉर्म कैसे स्वीकार हुए और समय-सीमा के बाद दाखिल अनुरोधों पर क्या प्रक्रिया अपनाई गई। इन सवालों पर चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

