सुपर अल नीनो से बढ़ा दुनिया पर गर्मी का खतरा: दिसंबर में पीक पर पहुंचेगा El Niño, 4.51 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान

2026 के सुपर अल नीनो से बढ़ते वैश्विक तापमान और मौसम के खतरे को दर्शाता चित्र
2026 में मजबूत हो रहा El Niño वैश्विक तापमान और बारिश के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।

प्रशांत महासागर का तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की आशंका; WMO के मुताबिक फरवरी 2027 तक बना रह सकता है असर, भारत समेत कई क्षेत्रों में सूखा, बाढ़ और लू का जोखिम बढ़ेगा

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर 2026। दुनिया इस समय एक बेहद मजबूत El Niño की चपेट में है, जो आने वाले महीनों में और तीव्र हो सकता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के ताजा अपडेट के मुताबिक, प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। WMO का अनुमान है कि यह El Niño दिसंबर के आसपास अपने चरम पर पहुंचेगा और फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत है। संगठन ने इसे कम से कम 1950 के बाद की सबसे मजबूत घटनाओं में से एक बताया है।

इस घटनाक्रम का असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहेगा। El Niño दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तापमान और बारिश के सामान्य पैटर्न को बदल सकता है। कहीं सामान्य से ज्यादा गर्मी और सूखे की स्थिति बन सकती है तो कहीं भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।

दिसंबर में चरम पर पहुंच सकता है El Niño

WMO के 8 अक्टूबर के ताजा अपडेट के मुताबिक, Niño 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान अगस्त 2026 में सामान्य से 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक था। अक्टूबर-दिसंबर की अवधि के लिए इसका मौसमी औसत विचलन करीब 3.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है।

यह आंकड़ा 2015-16 के मजबूत El Niño के दौरान दर्ज किए गए करीब 2.6 डिग्री सेल्सियस के पिछले रिकॉर्ड से भी ऊपर होगा। WMO के मुताबिक, अगर यह पूर्वानुमान सही रहता है तो मौजूदा घटना कम से कम 1950 के बाद की सबसे मजबूत El Niño घटनाओं में शामिल हो सकती है।

यही वजह है कि कई वैज्ञानिक और मीडिया रिपोर्ट इसे ‘Super El Niño’ कह रहे हैं। हालांकि, यह कोई अलग आधिकारिक मौसम-विज्ञान श्रेणी नहीं है, बल्कि असाधारण रूप से मजबूत El Niño को समझाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है।

2026 के सुपर अल नीनो से बढ़ते वैश्विक तापमान और मौसम के खतरे को दर्शाता चित्र

4.51 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान कितना गंभीर है?

University of Chicago के Climate Impact Lab के शोधकर्ताओं ने इस El Niño से जुड़े असामान्य तापमान के आधार पर दुनिया में करीब 4.51 लाख अतिरिक्त गर्मी-संबंधी मौतों का अनुमान लगाया है। यह अनुमान जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच की अवधि के लिए है और सामान्य वर्षों की तुलना में अतिरिक्त मौतों को दर्शाता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि 4.51 लाख मौतें निश्चित संख्या नहीं हैं। यह एक मॉडल-आधारित अनुमान है, जो संभावित तापमान और पिछले वर्षों में तापमान तथा मृत्यु दर के बीच देखे गए संबंधों के आधार पर तैयार किया गया है। Climate Impact Lab ने 24,378 क्षेत्रों के आंकड़ों को शामिल कर मौसमी तापमान पूर्वानुमानों के आधार पर यह आकलन किया है। शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि फरवरी 2027 के बाद भी प्रभाव जारी रह सकते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में भी आने वाले महीनों में अतिरिक्त गर्मी से हजारों अतिरिक्त गर्मी-संबंधी मौतों का जोखिम है। शोधकर्ताओं ने सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में करीब 15,800 अतिरिक्त heat deaths का अनुमान लगाया है।

पूरी दुनिया में एक जैसा असर नहीं होगा

El Niño का मतलब यह नहीं है कि पूरी दुनिया में एक साथ गर्मी बढ़ेगी या हर जगह सूखा पड़ेगा। इसका प्रभाव क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग होता है।

WMO के मौसमी पूर्वानुमान के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर के दौरान दुनिया के बड़े हिस्से में सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है। साथ ही बारिश के पैटर्न में भी बड़े बदलाव की आशंका है। कुछ क्षेत्रों में ज्यादा बारिश हो सकती है, जबकि भारत समेत कई इलाकों में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई है।

यही बदलाव खेती, जल संसाधनों, स्वास्थ्य और ऊर्जा व्यवस्था पर असर डाल सकते हैं। ज्यादा गर्मी से हीट स्ट्रोक और अन्य गर्मी-संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ता है, जबकि बारिश की कमी से सूखे और पानी की समस्या पैदा हो सकती है। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में El Niño के कारण भारी बारिश का पैटर्न बनता है, वहां बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।

भारत में पहले ही कमजोर रहा 2026 का मानसून

El Niño का असर भारत के मौसम पर भी महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत का 2026 दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश के साथ समाप्त हुआ। IMD के आंकड़ों के मुताबिक जून से सितंबर के बीच देश में करीब 759.4 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश करीब 868.6 मिलीमीटर होती है।

यह 2001 के बाद भारत का चौथा सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा। 2015 के बाद यह सबसे कमजोर मानसून भी रहा।

हालांकि, देश के सभी हिस्सों में बारिश की स्थिति एक जैसी नहीं रही। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में कमी काफी ज्यादा रही, जबकि मध्य भारत में बारिश अपेक्षाकृत सामान्य रही। इसलिए पूरे देश पर El Niño का प्रभाव एक समान मानना सही नहीं होगा।

El Niño होता क्या है?

El Niño को समझने के लिए प्रशांत महासागर की सामान्य स्थिति को समझना जरूरी है।

सामान्य परिस्थितियों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में व्यापारिक हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं। ये हवाएं गर्म सतही पानी को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। वहीं दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के पास समुद्र की गहराई से अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर आता है।

El Niño के दौरान ये व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप पश्चिमी प्रशांत में जमा गर्म पानी पूर्व की ओर फैलने लगता है। इससे मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से काफी ऊपर चला जाता है।

समुद्र के इस बड़े पैमाने पर गर्म होने से वायुमंडलीय परिसंचरण भी प्रभावित होता है और इसका असर प्रशांत क्षेत्र से हजारों किलोमीटर दूर तक मौसम के पैटर्न पर पड़ सकता है।

क्या El Niño सिर्फ गर्मी बढ़ाता है?

नहीं। El Niño का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव वर्षा के वैश्विक पैटर्न में बदलाव के रूप में सामने आता है।

WMO के अनुसार, मौजूदा मजबूत El Niño के दौरान कुछ क्षेत्रों में सामान्य से ज्यादा बारिश और दूसरे क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश की संभावना है। भारत के लिए अक्टूबर-दिसंबर अवधि में सामान्य से कम बारिश का संकेत दिया गया है।

यही कारण है कि एक ही समय में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बाढ़ और सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियां देखने को मिल सकती हैं।

क्या यह 1950 के बाद का सबसे ताकतवर El Niño होगा?

फिलहाल इसे निश्चित तौर पर कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन WMO के ताजा पूर्वानुमान के मुताबिक अक्टूबर-दिसंबर 2026 में Niño 3.4 का मौसमी तापमान विचलन करीब +3.7°C तक पहुंच सकता है, जो उपलब्ध रिकॉर्ड में सबसे ऊंचा होगा। संगठन ने इसे कम से कम 1950 के बाद की सबसे मजबूत El Niño घटनाओं में से एक होने की संभावना जताई है।

इसलिए आने वाले कुछ महीने महत्वपूर्ण होंगे। दिसंबर में संभावित चरम के बाद इसकी तीव्रता किस गति से घटती है और मौसम पर इसका प्रभाव कितने समय तक बना रहता है, यह वास्तविक परिस्थितियों और अगले पूर्वानुमानों से स्पष्ट होगा।

आने वाले महीनों में किन बातों पर नजर रहेगी?

  • दिसंबर 2026 के आसपास El Niño का संभावित चरम।
  • प्रशांत महासागर के समुद्री तापमान में आगे होने वाला बदलाव।
  • भारत और अन्य देशों में तापमान और बारिश का पैटर्न।
  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल उपलब्धता।
  • अत्यधिक गर्मी और heatwave से जुड़ी स्वास्थ्य घटनाएं।
  • भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन का जोखिम।
  • फरवरी 2027 तक El Niño के बने रहने की संभावना और उसके बाद की स्थिति।

यानी फिलहाल वैज्ञानिकों की चिंता केवल समुद्र के असामान्य रूप से गर्म होने को लेकर नहीं है, बल्कि उससे जुड़ी गर्मी, बारिश में बदलाव और स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर है। WMO के मुताबिक मौजूदा El Niño तेजी से मजबूत हो रहा है और इसके प्रभाव 2027 तक बने रह सकते हैं।


Nagendra sahu
Nagendra sahu
नागेन्द्र साहू छत्तीसगढ़ के भिलाई से हैं। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक (BJMC) और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (MJ) की शिक्षा प्राप्त की है। पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वीडियो एडिटिंग ( Ex- भिलाई Times Sr Editor ) और डिजिटल कंटेंट में भी विशेषज्ञता के साथ वर्तमान में रेखांकित न्यूज़ का संचालन कर रहे हैं।
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