
दक्षिणी ध्रुव की करीब एक घन किलोमीटर बर्फ में सेंसर लगाकर हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो का पता लगाने में अहम योगदान; IceCube ने दूरस्थ ब्रह्मांड से आने वाले कणों की पहचान कर न्यूट्रिनो एस्ट्रोनॉमी को नई दिशा दी
स्टॉकहोम, 8 अक्टूबर 2026। बेल्जियम में जन्मे भौतिक विज्ञानी फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने उन्हें IceCube Neutrino Observatory में निर्णायक योगदान और खगोलीय स्रोतों से आने वाले हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो की खोज के लिए सम्मानित किया है। हाल्जेन ने यह दिखाने में अहम भूमिका निभाई कि दक्षिणी ध्रुव की गहरी, बेहद साफ बर्फ को एक विशाल न्यूट्रिनो डिटेक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह विचार आगे चलकर IceCube ऑब्जर्वेटरी में बदला। करीब एक घन किलोमीटर बर्फ में हजारों ऑप्टिकल सेंसर लगाए गए हैं। जब कोई दुर्लभ न्यूट्रिनो बर्फ में मौजूद परमाणु के नाभिक से टकराता है, तो उससे पैदा होने वाली बेहद हल्की Cherenkov light को ये सेंसर पकड़ लेते हैं। इसी रोशनी के आधार पर वैज्ञानिक न्यूट्रिनो की दिशा और ऊर्जा का पता लगा सकते हैं।
न्यूट्रिनो क्या हैं और इन्हें पकड़ना इतना मुश्किल क्यों है?
न्यूट्रिनो बेहद हल्के और विद्युत आवेश रहित उपपरमाण्विक कण हैं। ये ब्रह्मांड में हर जगह मौजूद हैं और पदार्थ के साथ बेहद कम प्रतिक्रिया करते हैं। यही वजह है कि अरबों न्यूट्रिनो लगातार पृथ्वी और हमारे शरीर से गुजरते रहते हैं, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में उनका पता लगाना लगभग असंभव होता है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी के मुताबिक, बहुत कम मामलों में कोई न्यूट्रिनो परमाणु के नाभिक से टकराता है और तभी उसे डिटेक्टर के जरिए देखा जा सकता है।
इन कणों की एक खासियत उन्हें खगोल विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। प्रकाश या दूसरे विद्युतचुंबकीय संकेत रास्ते में प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन न्यूट्रिनो बेहद कम पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं। इसलिए वे अपने स्रोत से निकलने के बाद लगभग बिना बदले पृथ्वी तक पहुंच सकते हैं।
इसका मतलब है कि अगर वैज्ञानिक किसी हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो की दिशा पहचान लेते हैं, तो वे यह पता लगाने की कोशिश कर सकते हैं कि वह ब्रह्मांड के किस बेहद शक्तिशाली स्रोत से आया था।

दक्षिणी ध्रुव की बर्फ को बना दिया विशाल डिटेक्टर
हाल्जेन ने 1988 में वैज्ञानिक जॉन लर्न्ड के साथ गहरी ध्रुवीय बर्फ में हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो पकड़ने का विचार प्रस्तावित किया था। उस समय यह विचार बेहद महत्वाकांक्षी था। सवाल यह था कि इतने दुर्लभ कणों को पकड़ने के लिए आखिर कितना बड़ा डिटेक्टर बनाया जाए।
हाल्जेन ने इस समस्या का समाधान बर्फ में देखा। दक्षिणी ध्रुव पर कई किलोमीटर मोटी ग्लेशियर बर्फ मौजूद है। गहराई में मौजूद बर्फ बेहद साफ और पारदर्शी है, इसलिए इसमें प्रकाश के छोटे संकेत भी अपेक्षाकृत लंबी दूरी तक सेंसर तक पहुंच सकते हैं।
इस तरह पृथ्वी पर किसी विशाल कृत्रिम टैंक को बनाने के बजाय प्रकृति में मौजूद एक विशाल घन किलोमीटर बर्फ को ही डिटेक्टर का हिस्सा बनाने का विचार सामने आया।
शुरुआत में मिला सिर्फ 50 हजार डॉलर का रिसर्च फंड
यह परियोजना शुरुआत में किसी विशाल वैज्ञानिक अभियान के रूप में शुरू नहीं हुई थी। 1988 में हाल्जेन और उनके सहयोगियों को अमेरिकी National Science Foundation (NSF) से करीब 50 हजार डॉलर की शुरुआती राशि मिली थी। इसका इस्तेमाल अंटार्कटिक बर्फ की ऑप्टिकल गुणवत्ता का अध्ययन करने के लिए किया गया।
उस समय शोधकर्ताओं को बर्फ और उसमें गहराई तक ड्रिलिंग की वास्तविक चुनौतियों के बारे में भी बहुत कुछ पता नहीं था। यह शुरुआती अध्ययन आगे चलकर AMANDA (Antarctic Muon and Neutrino Detector Array) जैसे प्रयोगों में बदला और इसी अनुभव ने IceCube के लिए रास्ता तैयार किया।
यानी जिस प्रयोग की शुरुआत अपेक्षाकृत छोटे रिसर्च फंड से हुई थी, वह आगे चलकर दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी में बदल गया।
IceCube में हजारों सेंसर, 1 घन किलोमीटर बर्फ
IceCube का निर्माण दक्षिणी ध्रुव स्थित अमेरिकी Amundsen-Scott South Pole Station पर किया गया। इसके निर्माण की शुरुआत 2004 में हुई और ऑब्जर्वेटरी का निर्माण 2011 में पूरा हुआ। इसमें हजारों डिजिटल ऑप्टिकल मॉड्यूल बर्फ के भीतर गहराई में लगाए गए हैं।
जब कोई हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो बर्फ में मौजूद किसी परमाणु से टकराता है, तो इस टक्कर से दूसरे कण पैदा हो सकते हैं। इनसे निकलने वाली नीली रोशनी को बर्फ में लगे सेंसर रिकॉर्ड करते हैं। सेंसरों से मिले डेटा को मिलाकर वैज्ञानिक यह अनुमान लगाते हैं कि न्यूट्रिनो किस दिशा से आया और उसमें कितनी ऊर्जा थी।
इस तरह बर्फ का एक विशाल हिस्सा एक तरह की अंतरिक्षीय दूरबीन की भूमिका निभाता है।
2013 में मिला बड़ा वैज्ञानिक सबूत
IceCube के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक 2013 में सामने आई, जब वैज्ञानिकों ने बेहद ज्यादा ऊर्जा वाले ऐसे न्यूट्रिनो के प्रमाण हासिल किए जो हमारे सौरमंडल से बाहर के खगोलीय स्रोतों से आए थे।
इन न्यूट्रिनो की ऊर्जा पहले प्रयोगशालाओं में देखे गए न्यूट्रिनो की तुलना में 10 लाख गुना से भी अधिक थी। इस खोज ने इस बात का मजबूत प्रमाण दिया कि पृथ्वी तक बेहद दूर के ब्रह्मांडीय स्रोतों से हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो पहुंच रहे हैं।
इसके बाद IceCube के डेटा ने वैज्ञानिकों को ऐसे स्रोतों की पहचान करने में मदद की जो इन कणों को पैदा कर सकते हैं। 2018 में एक सुपरमैसिव ब्लैक होल वाली दूसरी आकाशगंगा से न्यूट्रिनो के आने के ठोस प्रमाण मिले। 2023 में IceCube ने हमारी अपनी Milky Way Galaxy से आने वाले न्यूट्रिनो का पहला न्यूट्रिनो-आधारित चित्र भी तैयार किया।
ब्रह्मांड को देखने का नया तरीका
अब तक खगोल वैज्ञानिक ब्रह्मांड को मुख्य रूप से प्रकाश, रेडियो तरंगों, एक्स-रे, गामा किरणों और अन्य विद्युतचुंबकीय संकेतों के माध्यम से देखते रहे हैं। न्यूट्रिनो ने इस तस्वीर में एक बिल्कुल नया माध्यम जोड़ दिया।
इसे ऐसे समझा जा सकता है—अगर कोई दूर की अंतरिक्षीय घटना बहुत शक्तिशाली न्यूट्रिनो पैदा करती है, तो वे लगभग सीधे उस स्रोत से पृथ्वी की ओर आ सकते हैं। IceCube उन्हें रिकॉर्ड करके वैज्ञानिकों को उस घटना तक पहुंचने का एक और रास्ता देता है।
इसीलिए न्यूट्रिनो को कभी-कभी ‘ghost particles’ यानी भूत जैसे कण कहा जाता है। वे लगातार हमारे बीच से गुजरते हैं, लेकिन सामान्य पदार्थ के साथ इतनी कम प्रतिक्रिया करते हैं कि उन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल है।

हाल्जेन ने खुद इसे टीम की सफलता बताया
नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद हाल्जेन ने इस सम्मान को केवल अपने व्यक्तिगत काम के रूप में नहीं देखा। IceCube सहयोग में 14 देशों के 58 संस्थानों के करीब 450 वैज्ञानिक शामिल हैं। ऑब्जर्वेटरी के निर्माण, संचालन और डेटा विश्लेषण में बड़ी अंतरराष्ट्रीय टीम ने दशकों तक काम किया है।
हाल्जेन ने कहा कि यह उनके लिए बड़ा आश्चर्य था और उन्होंने इस उपलब्धि का श्रेय उस पूरी टीम को दिया जिसने इस असामान्य परियोजना को संभव बनाया।
फ्रांसिस हाल्जेन कौन हैं?
फ्रांसिस हाल्जेन का जन्म 1944 में बेल्जियम के टिएनेन में हुआ था। उन्होंने KU Leuven से पीएचडी की और बाद में अमेरिका की University of Wisconsin–Madison से जुड़े। वे लंबे समय से कॉस्मिक रे और पार्टिकल एस्ट्रोफिजिक्स के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
उनका करियर इस बात का उदाहरण है कि किसी बेहद कठिन वैज्ञानिक समस्या को अलग नजरिए से देखने पर नई दिशा निकल सकती है। न्यूट्रिनो को पकड़ने के लिए उन्होंने प्रयोगशाला में एक सामान्य डिटेक्टर बनाने के बजाय प्रकृति की सबसे बड़ी उपलब्ध संरचनाओं में से एक—अंटार्कटिक बर्फ—को ही डिटेक्टर का हिस्सा बना दिया।

नोबेल पुरस्कार में कितनी राशि मिलेगी?
2026 के भौतिकी नोबेल पुरस्कार के साथ 12 मिलियन स्वीडिश क्रोनर की पुरस्कार राशि है। चूंकि इस साल भौतिकी का पुरस्कार अकेले फ्रांसिस हाल्जेन को मिला है, इसलिए यह पूरी राशि उन्हें मिलेगी।
नोबेल पुरस्कार की औपचारिक पुरस्कार समारोह 10 दिसंबर 2026 को होगी। परंपरा के अनुसार उस दिन विजेताओं को मेडल और डिप्लोमा के साथ पुरस्कार राशि प्रदान की जाएगी।
आगे क्या होगा?
IceCube की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। 2025-26 में IceCube Upgrade स्थापित किया गया है, जिसका उद्देश्य डिटेक्टर की संवेदनशीलता बढ़ाना और बर्फ के गुणों को बेहतर तरीके से समझना है। इसके बाद प्रस्तावित IceCube-Gen2 मौजूदा डिटेक्टर से कई गुना बड़ा होगा और ज्यादा ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो को पकड़ने की क्षमता बढ़ाएगा।
इस लिहाज से 2026 का भौतिकी नोबेल केवल एक वैज्ञानिक खोज का सम्मान नहीं है। यह उस विचार की मान्यता भी है जिसमें अंटार्कटिक बर्फ को एक विशाल अंतरिक्षीय डिटेक्टर में बदलकर ब्रह्मांड के उन संदेशों को सुनने की कोशिश की गई, जिन्हें पारंपरिक दूरबीनें नहीं पकड़ सकती थीं।

