SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़े विवाद के बीच कांग्रेस नेता ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को किसी न किसी दिन इस्तीफा देना पड़ेगा। चुनाव आयोग ने हालांकि कहा है कि SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं।

नई दिल्ली: विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर चुनाव आयोग पर चल रही राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। शनिवार, 3 अक्टूबर को ANI से बातचीत में चिदंबरम ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि ज्ञानेश कुमार को “आज नहीं तो कल” इस्तीफा देना ही होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर CEC अभी पद छोड़ देते हैं तो यह उनके लिए बेहतर होगा, अन्यथा विरोध-प्रदर्शन जारी रहेंगे।
चिदंबरम का यह बयान ऐसे समय आया है जब SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। उन्होंने कहा कि विपक्ष और दूसरे समूहों का विरोध तब तक जारी रह सकता है, जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त पद से नहीं हटते। हालांकि यह चिदंबरम और विपक्ष का राजनीतिक रुख है; चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर किसी तरह की निर्णय प्रक्रिया में असहमति के अंतिम परिणाम से इनकार किया है।
चुनाव अधिकारियों से क्या चाहते हैं चिदंबरम?
चिदंबरम ने महाराष्ट्र, कर्नाटक और ओडिशा के चुनाव अधिकारियों से जुड़े हालिया घटनाक्रमों का हवाला देते हुए राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों से सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने की अपील की।
उन्होंने सवाल उठाया कि अधिकारियों को चुनाव आयोग से क्या निर्देश मिले, वे निर्देश कब दिए गए और उनका पालन किस तरीके से किया गया। चिदंबरम ने यह भी कहा कि अगर अधिकारियों ने SIR की प्रक्रिया को लेकर कोई आपत्ति जताई थी तो यह भी सामने आना चाहिए कि उस आपत्ति पर चुनाव आयोग या मुख्य चुनाव आयुक्त ने क्या कार्रवाई की।
चिदंबरम ने SIR को अपने शब्दों में “गैरकानूनी” बताया है। यह उनका आरोप है, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं। SIR की वैधता और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अदालतों में भी सवाल उठाए गए हैं, जबकि चुनाव आयोग अपनी प्रक्रिया को कानूनी और निर्धारित नियमों के अनुरूप बताता रहा है।
चुनाव आयोग के अंदर 14 आपत्तियों की रिपोर्ट क्या है?
विवाद का एक प्रमुख आधार द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट में Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची से जुड़े मामलों, चुनावी डेटा और सॉफ्टवेयर के नियंत्रण तथा कुछ प्रशासनिक फैसलों को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में दोनों अधिकारियों ने संबंधित फैसलों को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे।
इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद यह सवाल उठा कि क्या तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर वास्तव में निर्णय लेने को लेकर मतभेद थे और क्या कुछ फैसले सभी सदस्यों की जानकारी या सहमति के बिना लिए गए।
हालांकि चुनाव आयोग ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया है।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने कहा है कि सदस्यों के बीच अलग-अलग सुझाव या टिप्पणियां किसी संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक, पिछले एक साल में लिए गए फैसले, जिसमें SIR से जुड़े फैसले भी शामिल हैं, पूरे आयोग के सर्वसम्मत निर्णय थे।
आयोग ने यह भी कहा कि आंतरिक टिप्पणियों और सुझावों को अंतिम फैसले से अलग करके देखने से पूरी निर्णय प्रक्रिया की तस्वीर सामने नहीं आती।
दूसरी ओर, द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जिन दस्तावेजों का हवाला दिया गया, उनमें दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कुछ फैसलों पर दर्ज आपत्तियों का उल्लेख है। इसलिए फिलहाल विवाद का एक प्रमुख हिस्सा यही है कि इन आपत्तियों को सामान्य आंतरिक सुझाव माना जाए या निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक असहमति के संकेत के रूप में देखा जाए।
दूसरे दो चुनाव आयुक्तों के इस्तीफे पर चिदंबरम का रुख
जब चिदंबरम से पूछा गया कि क्या विपक्ष चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू के इस्तीफे की भी मांग कर रहा है, तो उन्होंने इससे इनकार किया।
उनका कहना था कि फिलहाल विपक्ष की मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर है। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में दूसरे दोनों चुनाव आयुक्तों की भूमिका को लेकर कोई संदिग्ध या गैरकानूनी तथ्य सामने आता है, तब उनके इस्तीफे की मांग पर विचार किया जा सकता है।
यह बयान महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि चिदंबरम की मौजूदा मांग पूरे चुनाव आयोग के बजाय मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका और उनसे जुड़े विवाद पर केंद्रित है।
SIR को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग आमने-सामने
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं और इससे पात्र मतदाताओं के सामने परेशानी पैदा हो सकती है।
वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अद्यतन और सही रखने के लिए पुनरीक्षण आवश्यक प्रक्रिया है। आयोग के अनुसार, मतदाता का नाम हटाने जैसी कार्रवाई तय प्रक्रिया और सत्यापन के बाद ही की जानी चाहिए।
सितंबर में सामने आई रिपोर्टों के बाद विवाद और बढ़ गया था। द इंडियन एक्सप्रेस ने दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज 14 आपत्तियों का हवाला दिया था। इसके जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि ये टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा थीं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

विरोध-प्रदर्शन भी तेज
CEC के इस्तीफे की मांग अब सिर्फ राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रही है। 2 और 3 अक्टूबर को दिल्ली समेत कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों की मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और SIR की प्रक्रिया को लेकर जवाबदेही शामिल रही। दिल्ली में विरोध के दौरान पुलिस कार्रवाई और हिरासत की घटनाएं भी सामने आईं।
इसी बीच चुनाव आयोग ने SIR के दौरान छूट गए पात्र मतदाताओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू करने की जानकारी दी है। आयोग के मुताबिक इस अभियान का उद्देश्य ऐसे वास्तविक मतदाताओं की पहचान करना है जो प्रक्रिया के दौरान सूची से बाहर रह गए हों।
मामला अब राजनीतिक विवाद से आगे भी पहुंच रहा है
SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवाल अब न्यायिक स्तर पर भी पहुंच चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और SIR से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ फैसले आयोग के अन्य सदस्यों की अनिवार्य सामूहिक भागीदारी के बिना लिए गए। ये फिलहाल याचिकाकर्ता के आरोप हैं; अदालत का अंतिम फैसला अलग विषय है।
इस पूरे विवाद में फिलहाल दो अलग-अलग दावे सामने हैं। एक तरफ विपक्ष और कुछ रिपोर्टों में चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों तथा SIR की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि अलग-अलग टिप्पणियां आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
ऐसे में आने वाले दिनों में अदालतों की कार्यवाही, चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण और SIR के तहत मतदाता सूची में होने वाले बदलाव इस विवाद की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण घटनाक्रम होंगे।

