
SIR को लेकर जारी विवाद के बीच विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, जबकि चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मति से लिया जाना बताया है।
कोलकाता/नई दिल्ली, 26 सितंबर 2026। Special Intensive Revision (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्षी नेताओं के हमले तेज हो गए हैं। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें तंज कसते हुए “वैनिश कुमार” यानी “गायब कुमार” कहा और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर उनके इस्तीफे की मांग की। वहीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने चुनावों में “मैच फिक्सिंग” के लिए अंपायर बनाया है। ये दोनों राजनीतिक नेताओं के आरोप हैं।
ममता बनर्जी का यह बयान ऐसे समय आया है जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद कहा है कि SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं।
ममता ने कहा- नाम काटे हैं तो पद छोड़ना होगा
हुगली में शनिवार को एक रैली के दौरान ममता बनर्जी ने CEC ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। उन्होंने SIR के दौरान मतदाता सूची से लोगों के नाम “गायब” किए जाने का आरोप लगाया और कहा कि जब तक यह मुद्दा हल नहीं होता, उनका विरोध जारी रहेगा।
ममता का यह बयान पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच आया है, जहां मतदाता सूची में बदलाव और नामों के हटने को लेकर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी दलों के बीच लगातार आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं।
राहुल गांधी ने ‘मैच फिक्सिंग’ का लगाया आरोप
राहुल गांधी ने भी 25 सितंबर को चुनाव आयोग और CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर तीखी राजनीतिक टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी और शाह ने ज्ञानेश कुमार को “अंपायर” बनाकर चुनावों में मैच फिक्सिंग की जिम्मेदारी दी है। राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी दोहराई। राहुल गांधी के ये आरोप SIR और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद आए हैं। चुनाव आयोग ने हालांकि आंतरिक मतभेद की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा है कि आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
CJP ने भी CEC के खिलाफ मोर्चा खोला
TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने CEC को हटाने के सवाल पर Cockroach Janta Party (CJP) का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं है और CJP ही ऐसा करने में सक्षम होने का दावा कर रही है।
CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देने के लिए समयसीमा दी है और आगे देशव्यापी प्रदर्शन की बात कही है।
विपक्षी दलों की INDIA ब्लॉक बैठक पर भी चर्चा
CEC को लेकर विपक्षी दलों के बीच समन्वय बढ़ने की खबरें हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, INDIA ब्लॉक की बैठक बुलाने को लेकर विभिन्न दलों के बीच बातचीत चल रही है। इसमें SIR और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त रणनीति पर चर्चा की जा सकती है।
CPI(ML) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी SIR के मुद्दे पर INDIA ब्लॉक की बैठक बुलाने की मांग कर चुके हैं। वहीं CPM महासचिव एमए बेबी और ममता बनर्जी के बीच भी इस मुद्दे पर बातचीत की जानकारी सामने आई है।
प्रियंका गांधी और वेणुगोपाल ने भी उठाए सवाल
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा है कि यदि जांच में यह साबित होता है कि चुनाव प्रक्रिया में गैरकानूनी तरीके से हस्तक्षेप किया गया और CEC इसकी जानकारी के बावजूद इसमें शामिल रहे, तो उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने CEC को मिली कानूनी सुरक्षा पर भी सवाल उठाया। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी ज्ञानेश कुमार पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए और उन्हें “जुडास” कहा।
आखिर विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
पूरे विवाद की पृष्ठभूमि द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की जांच रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। इनमें चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज किए जाने का दावा किया गया है।
रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, Form-6 में बदलाव, चुनावी डेटा के केंद्रीकरण और SIR से जुड़े मामलों पर आपत्तियों का जिक्र है।
रिपोर्ट में उठे चार प्रमुख मुद्दे
1. Form-6 में बदलाव
रिपोर्ट के मुताबिक, नए मतदाताओं के Form-6 में पिछली SIR की मतदाता सूची में स्वयं या माता-पिता/दादा-दादी के नाम से जुड़ी जानकारी मांगे जाने पर सवाल उठाए गए थे।
2. वोटर डेटा का केंद्रीकरण
दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर मतदाता डेटाबेस के नियंत्रण को दिल्ली में केंद्रीकृत किए जाने और राज्यों की पहुंच सीमित होने को लेकर चिंता जताई।
3. पश्चिम बंगाल की करीब 16 लाख अपीलें
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में हटाए गए नामों से संबंधित करीब 16 लाख अपीलों को लेकर भी सवाल उठाए जाने का उल्लेख है।
4. गोवा के 97 मतदाता
गोवा में SIR के दौरान 97 ऐसे मतदाताओं का मामला सामने आया जिन्हें स्थानीय स्तर पर पात्र पाए जाने के बावजूद अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सका। बाद में गोवा के CEO कार्यालय ने कहा कि इनमें से कई को बाद में सूची में शामिल किया गया और बाकी मामलों पर प्रक्रिया जारी है।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
इन रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद की बात से इनकार किया। आयोग से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि SIR सहित सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से और सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि आयुक्तों की ओर से कुछ मुद्दों पर चिंता जताई गई थी, लेकिन इसे अंतिम फैसलों से असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
गोवा के 97 मतदाताओं के मामले में भी CEO कार्यालय ने बताया है कि कई मामलों को बाद में अलग प्रक्रिया के जरिए निपटाया गया और बाकी मामलों पर कार्रवाई चल रही है।
इस तरह फिलहाल विवाद दो अलग पहलुओं पर केंद्रित है—एक तरफ विपक्ष SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहा है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि उसके फैसले संवैधानिक और निर्धारित प्रक्रिया के तहत सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

