दिल्ली पुलिस के नए आदेश के बाद रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के CBD मैदान को प्रदर्शन के लिए निर्धारित किया गया है। फैसला ऐसे समय आया है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में दिल्ली में प्रदर्शन को लेकर विवाद चल रहा है।

नई दिल्ली | 13 अक्टूबर 2026
दिल्ली का जंतर-मंतर दशकों से राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, किसान समूहों, कर्मचारी यूनियनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। संसद और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालयों के नजदीक होने के कारण यह जगह देशभर के आंदोलनों की आवाज राजधानी तक पहुंचाने का एक अहम माध्यम बनी। लेकिन अब दिल्ली पुलिस के नए आदेश के बाद जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थलों की सूची से हटा दिया गया है।
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार की ओर से 11 अक्टूबर को जारी स्टैंडिंग ऑर्डर संख्या L&O/48/2026 के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर तीन वैकल्पिक स्थलों को प्रदर्शन के लिए निर्धारित किया गया है। इनमें मध्य दिल्ली का रामलीला मैदान, उत्तर-पश्चिम दिल्ली का बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का CBD मैदान शामिल हैं। इन स्थानों पर प्रदर्शन आयोजित करने के लिए संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अलग से जारी की जाएगी।
यह आदेश 28 अप्रैल 2022 को जारी पुराने स्टैंडिंग ऑर्डर में आंशिक संशोधन करता है। हालांकि, नए आदेश में तीनों स्थलों पर प्रदर्शन की अनुमति, भीड़ की सीमा और अन्य शर्तों का पूरा विवरण नहीं दिया गया है

CJP के प्रदर्शन के बीच आया फैसला
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला ऐसे समय आया है, जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और दूसरे संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तथा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) को रद्द करने की मांग को लेकर आंदोलन किया था।

CJP ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगने के लिए दिल्ली पुलिस से संपर्क किया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने नए आदेश के जरिए जंतर-मंतर को निर्धारित स्थलों की सूची से हटा दिया। इससे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच अनुमति तथा विरोध के अधिकार को लेकर विवाद और गहरा गया।

CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इस फैसले को तानाशाही कदम बताते हुए सरकार की आलोचना की। पार्टी के सह-संयोजक सौरव दास ने इसे अस्वीकार्य बताया और कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने तथा विरोध दर्ज कराने के अधिकार पर इस फैसले का असर पड़ेगा। पार्टी ने प्रदर्शन की अनुमति देने के लिए दिल्ली पुलिस को 24 घंटे का अल्टीमेटम देने की बात भी कही।

वामपंथी छात्र संगठन आइसा की नेता नेहा बोरा की टीम ने भी जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का विरोध किया। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को दिल्ली के बाहरी इलाकों में भेजने से विरोध दर्ज कराने के अधिकार पर असर पड़ सकता है।
ये नेताओं और संगठनों की प्रतिक्रियाएं हैं। दिल्ली पुलिस के आदेश में फैसले का आधार गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को बताया गया है।
तीन नए प्रदर्शन स्थलों में क्या अंतर है?

दिल्ली के मध्य में स्थित यह मैदान राजनीतिक रैलियों और जन आंदोलनों का पुराना केंद्र है। 1975 में जयप्रकाश नारायण की रैली और 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण भी इसे व्यापक पहचान मिली।

उत्तर-पश्चिम दिल्ली में स्थित इस मैदान का नाम 2020 के किसान आंदोलन के दौरान चर्चा में आया था। उस समय प्रदर्शनकारियों को यहां आने का विकल्प दिया गया था।

यह दिल्ली के पूर्वी हिस्से में स्थित है। नए आदेश में इसे भी विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थल बनाया गया है। यहां प्रदर्शन की अनुमति और संचालन से जुड़ी विस्तृत शर्तें अलग से जारी की जानी हैं।
जंतर-मंतर से दूरी के लिहाज से रामलीला मैदान लगभग तीन किलोमीटर, CBD मैदान करीब 13 किलोमीटर और बुराड़ी मैदान लगभग 21 किलोमीटर दूर बताया गया है। इस बदलाव के बाद संसद और केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र के नजदीक प्रदर्शन आयोजित करने का पहले जैसा विकल्प नहीं रहेगा। हालांकि, प्रदर्शन की अनुमति और नई जगहों पर लागू शर्तें आने वाले SOP से स्पष्ट होंगी।

जंतर-मंतर कैसे बना आंदोलनों का केंद्र?
जंतर-मंतर मूल रूप से एक खगोलीय वेधशाला है। इसका निर्माण 18वीं सदी में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था। बाद के दशकों में इसके आसपास की सड़क विरोध प्रदर्शनों के लिए पहचानी जाने लगी।
1960 के दशक के उत्तरार्ध से 1980 के दशक तक दिल्ली में बोट क्लब का इलाका बड़े राजनीतिक और जन आंदोलनों का प्रमुख केंद्र था। संसद और सरकारी कार्यालयों के आसपास होने वाले प्रदर्शनों को नियंत्रित करने की कोशिशों के बीच 1990 के दशक में जंतर-मंतर एक वैकल्पिक स्थल के रूप में उभरा। यह संसद के नजदीक था और प्रदर्शनकारियों को अपनी मांगें सार्वजनिक रूप से रखने का अवसर देता था।
इस स्थान पर समय-समय पर कई बड़े आंदोलन हुए। नर्मदा बचाओ आंदोलन, 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, 2012 में निर्भया मामले के बाद हुए प्रदर्शन, 2015 में वन रैंक वन पेंशन की मांग और 2017 में तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन इनमें प्रमुख हैं।
दिल्ली पुलिस के अभिलेखों पर आधारित एक अध्ययन के मुताबिक, जनवरी 2006 से अगस्त 2010 के बीच जंतर-मंतर पर कम से कम 13,118 धरने और 5,491 प्रदर्शन, रैलियां तथा जुलूस दर्ज किए गए थे। ये आंकड़े उस दौर में इस स्थल पर आंदोलनों की व्यापकता को दिखाते हैं।
पहले भी प्रदर्शन स्थल बदलने की कोशिश हुई
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को लेकर विवाद नया नहीं है। स्थानीय निवासियों की ओर से शोर, कचरे, अस्थायी ढांचों और लंबे समय तक धरना जारी रहने जैसी समस्याएं उठाई जाती रही हैं। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी इसे अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण स्थान मानते रहे हैं।
5 अक्टूबर 2017 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने जंतर-मंतर रोड पर धरने, सार्वजनिक सभाओं और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाने का आदेश दिया था। प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने की बात भी कही गई। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
23 जुलाई 2018 को मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण सभा के संवैधानिक अधिकार और स्थानीय निवासियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया। अदालत ने प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध को समाधान नहीं माना और अधिकारियों से ऐसा नियामक ढांचा बनाने को कहा, जिससे प्रदर्शन का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था दोनों सुरक्षित रह सकें।
इसके बाद जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पूर्व अनुमति और निर्धारित शर्तों के अधीन जारी रहे। अब 2026 के नए आदेश ने इस व्यवस्था को फिर बदल दिया है।
क्या प्रदर्शन का अधिकार खत्म हो गया है?
जंतर-मंतर को निर्धारित स्थल की सूची से हटाने का अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि देश में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार समाप्त हो गया है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य वैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2018 के फैसले में स्पष्ट किया था कि लोकतांत्रिक राजधानी को स्थायी निषेधाज्ञा वाले क्षेत्र में नहीं बदला जा सकता, लेकिन प्रदर्शन की स्वतंत्रता का इस्तेमाल दूसरे नागरिकों के जीवन को अनिश्चितकाल तक बाधित करने के लिए भी नहीं किया जा सकता।
इसलिए मौजूदा विवाद का अहम सवाल यह है कि नई व्यवस्था में प्रदर्शन की अनुमति किस प्रक्रिया से मिलेगी, शर्तें कितनी व्यावहारिक होंगी और क्या प्रदर्शनकारियों को अपनी मांगें सरकार तथा जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अवसर मिलेगा।
जंतर-मंतर पर दशकों तक जुटी भीड़ इस जगह को सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि जन आंदोलनों की पहचान बना चुकी है। अब प्रदर्शन के लिए तीन नए स्थलों का निर्धारण किया गया है। इस बदलाव का वास्तविक असर नई SOP, अनुमति देने की प्रक्रिया और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के संचालन में अपनाए जाने वाले नियमों से स्पष्ट होगा।

