भास्कर की पड़ताल में 2021 से अप्रैल 2024 के बीच खरपतवार हटाने के नाम पर ₹18 करोड़, जलस्तर बढ़ाने के लिए ₹57 करोड़ और बांस की सफाई पर ₹8 करोड़ खर्च का उल्लेख। रिपोर्ट में चारा, वन्यजीव संरक्षण और अन्य योजनाओं के खर्च पर भी सवाल उठाए गए हैं।

बीजापुर, छत्तीसगढ़।
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग स्थित इंद्रावती टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण और जंगल के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद जमीनी कामकाज को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक समाचार पत्र की पड़ताल में वर्ष 2021 से अप्रैल 2024 के बीच करीब 105 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का विवरण सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस राशि का बड़ा हिस्सा खरपतवार हटाने, जलस्तर बढ़ाने, बांस की सफाई, वन्यजीवों के लिए चारा और अन्य संरक्षण कार्यों पर खर्च किया गया।
सबसे गंभीर सवाल उन इलाकों को लेकर है, जहां नक्सली गतिविधियों के कारण अधिकारियों और कर्मचारियों की आवाजाही कठिन बताई जाती रही है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कई क्षेत्रों में काम की वास्तविक स्थिति का सत्यापन करना मुश्किल था, जबकि अलग-अलग मदों में बड़ी रकम खर्च की गई।
यह मामला सिर्फ सरकारी धन के खर्च का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि वन्यजीव संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण उद्देश्य के लिए आवंटित राशि का उपयोग कितना प्रभावी रहा। हालांकि, खर्च में अनियमितता या काम केवल कागजों पर होने के आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, भुगतान विवरण, निरीक्षण रिपोर्ट और स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
तीन साल में करीब 105 करोड़ खर्च का दावा
भास्कर की पड़ताल के अनुसार, इंद्रावती टाइगर रिजर्व में जनवरी 2021 से अप्रैल 2024 के बीच करीब 105 करोड़ रुपये खर्च किए गए। रिपोर्ट में बताया गया है कि रिजर्व क्षेत्र में लगभग 180 गांव हैं और वर्ष 2024 तक करीब 150 गांव ऐसे क्षेत्र में थे, जहां नक्सली प्रभाव की बात कही गई थी।
ऐसे क्षेत्रों में वन विभाग के अधिकारियों की नियमित पहुंच, निर्माण कार्यों का निरीक्षण और भुगतान के बाद काम की गुणवत्ता की जांच करना बड़ी प्रशासनिक चुनौती हो सकती है। लेकिन यही परिस्थितियां खर्च की पारदर्शिता और निगरानी को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं।
यदि किसी क्षेत्र में अधिकारी सुरक्षा कारणों से नहीं पहुंच पा रहे थे, तो वहां किए गए कार्यों का सत्यापन किस आधार पर हुआ? क्या काम पूरा होने के प्रमाण, तस्वीरें, माप पुस्तिकाएं और भुगतान से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध हैं? क्या किसी स्वतंत्र टीम ने इन कार्यों की जांच की? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।
खरपतवार हटाने के नाम पर 18 करोड़
रिपोर्ट में इंद्रावती टाइगर रिजर्व में खरपतवार हटाने के लिए लगभग 18 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का उल्लेख है। खरपतवार हटाने का उद्देश्य जंगल में स्थानीय वनस्पतियों को बढ़ावा देना और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास की गुणवत्ता सुधारना हो सकता है।
लेकिन इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद यह देखना जरूरी है कि कितने क्षेत्र में काम किया गया, किन प्रजातियों के खरपतवार हटाए गए और उससे जंगल की पारिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ा।
रिपोर्ट में इस खर्च की उपयोगिता और वास्तविक परिणामों पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, उपलब्ध अखबारी सामग्री से यह स्पष्ट नहीं होता कि पूरे कार्य का तकनीकी मूल्यांकन क्या था या संबंधित विभाग ने कितने क्षेत्र में काम पूरा होने की पुष्टि की थी।
जलस्तर बढ़ाने के लिए 57 करोड़ खर्च
इंद्रावती टाइगर रिजर्व में जलस्तर बढ़ाने के नाम पर लगभग 57 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की बात रिपोर्ट में सामने आई है। जंगल में जलस्रोतों का संरक्षण वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर उन इलाकों में जहां गर्मियों के दौरान पानी की उपलब्धता चुनौती बन सकती है।
रिपोर्ट में इस खर्च के औचित्य और परिणामों पर भी सवाल उठाए गए हैं। यह जानना जरूरी है कि किन स्थानों पर जल संरक्षण के कार्य किए गए, कितने जलस्रोत विकसित या पुनर्जीवित हुए और गर्मियों में उनकी स्थिति क्या रही।
यदि जल संरक्षण पर इतनी बड़ी राशि खर्च हुई है, तो विभाग को कामों की सूची, स्थान, स्वीकृत बजट, वास्तविक भुगतान और परिणामों का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। इससे यह आकलन किया जा सकेगा कि खर्च से वन्यजीवों और स्थानीय पारिस्थितिकी को कितना लाभ मिला।
बांस की सफाई पर 8 करोड़, चारे के लिए 7 करोड़
अखबारी रिपोर्ट में जंगल के भीतर बांस की सफाई पर लगभग 8 करोड़ रुपये और वन्यजीवों के लिए चारा उगाने के नाम पर करीब 7 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का उल्लेख है।
बांस के जंगलों का प्रबंधन और वन्यजीवों के लिए भोजन की उपलब्धता बनाए रखना वन प्रबंधन के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं। लेकिन इन कार्यों की सफलता का आकलन केवल खर्च की राशि से नहीं, बल्कि काम के वास्तविक परिणामों से होना चाहिए।
बांस की सफाई कितने क्षेत्र में की गई? क्या वहां बांस की स्थिति में सुधार हुआ? चारा उगाने के लिए किन स्थानों का चयन किया गया और क्या वहां वन्यजीवों को भोजन उपलब्ध हुआ? इन सवालों के जवाब कार्यस्थल निरीक्षण और विभागीय रिकॉर्ड से ही मिल सकते हैं।
रिपोर्ट में इन खर्चों को लेकर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन संबंधित मदों में अनियमितता सिद्ध होने की जानकारी उपलब्ध सामग्री में नहीं है।
जंगल के भीतर काम हुआ या सिर्फ दस्तावेज तैयार हुए?
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिन क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियों के कारण पहुंचना मुश्किल था, वहां विकास और संरक्षण कार्यों की निगरानी कैसे की गई।
अखबारी पड़ताल में अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि नक्सलियों के भय के कारण इंद्रावती टाइगर रिजर्व के अंदरूनी क्षेत्रों तक पहुंचना कठिन था। यदि यह स्थिति रही, तो काम पूरा होने की पुष्टि के लिए अपनाई गई प्रक्रिया की जांच करना जरूरी है।
ऐसे मामलों में केवल भुगतान संबंधी दस्तावेज पर्याप्त नहीं होते। कार्यस्थल की तस्वीरें, भौगोलिक निर्देशांक, माप पुस्तिका, ठेकेदारों के बिल, निरीक्षण रिपोर्ट और काम पूरा होने का प्रमाण महत्वपूर्ण होते हैं। यदि इनका सत्यापन स्वतंत्र रूप से किया जाए, तो खर्च और जमीनी परिणाम के बीच अंतर का पता लगाया जा सकता है।
यह भी स्पष्ट करना होगा कि संबंधित कार्यों की जिम्मेदारी किस अधिकारी या एजेंसी को दी गई थी और कामों की निगरानी के लिए कौन-सी व्यवस्था लागू थी।
टेंडर, मजदूरी और भुगतान की प्रक्रिया पर भी सवाल
रिपोर्ट में जंगल के भीतर कराए गए कार्यों, भुगतान और ठेके की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ कामों में मजदूरों के नाम पर भुगतान और कार्यों के सत्यापन की व्यवस्था पर संदेह जताया गया है।
यदि किसी कार्य में टेंडर के बजाय दूसरी प्रक्रिया अपनाई गई थी, तो यह देखना जरूरी होगा कि उस समय लागू नियमों के तहत वह प्रक्रिया अनुमत थी या नहीं। इसी तरह मजदूरी, सामग्री खरीद और कार्यस्थल पर खर्च की पुष्टि के लिए संबंधित रिकॉर्ड का परीक्षण आवश्यक है।
किसी प्रक्रिया का टेंडर के बिना होना अपने आप में हर स्थिति में अनियमितता साबित नहीं करता। लेकिन बड़े सार्वजनिक खर्च के मामले में अपनाई गई प्रक्रिया, उसकी अनुमति और भुगतान के आधार को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
वन्यजीव संरक्षण के उद्देश्य और जमीनी परिणाम
इंद्रावती टाइगर रिजर्व जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां जंगल, जलस्रोत और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना दीर्घकालिक पर्यावरणीय जरूरत है।
इसलिए संरक्षण कार्यों पर खर्च की समीक्षा केवल वित्तीय लेखा-जोखा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी जांचना जरूरी है कि क्या कामों से वन्यजीवों के आवास में सुधार हुआ, पानी की उपलब्धता बढ़ी, वनस्पति को लाभ मिला और जंगल के पारिस्थितिक संतुलन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
यदि करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, तो उनके परिणामों का वैज्ञानिक और स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए। इससे यह पता चलेगा कि योजनाओं का वास्तविक लाभ क्या रहा और भविष्य में धन का उपयोग अधिक प्रभावी तरीके से कैसे किया जा सकता है।
अब किन दस्तावेजों और जवाबों की जरूरत है?
इस मामले में वन विभाग और इंद्रावती टाइगर रिजर्व प्रबंधन से कुछ बुनियादी जानकारियां सार्वजनिक किए जाने की जरूरत है:
- वर्ष 2021 से अप्रैल 2024 तक खर्च की गई राशि का मदवार विवरण।
- खरपतवार हटाने, जलस्तर बढ़ाने और बांस की सफाई से जुड़े कार्यों की सूची।
- संबंधित कार्यों के स्वीकृति आदेश, भुगतान रिकॉर्ड और माप पुस्तिकाएं।
- कार्यस्थलों के निरीक्षण तथा काम पूरा होने की प्रमाणित रिपोर्ट।
- नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम की निगरानी के लिए अपनाई गई प्रक्रिया।
- आंतरिक या स्वतंत्र ऑडिट में सामने आई आपत्तियों और उनके निराकरण का विवरण।
- खर्च के मुकाबले वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय परिणामों का मूल्यांकन।
इन जानकारियों के आधार पर यह स्पष्ट हो सकेगा कि खर्च नियमानुसार हुआ, काम अपेक्षित स्तर पर पूरे हुए या नहीं और किसी तरह की प्रशासनिक अथवा वित्तीय अनियमितता सामने आई है या नहीं।
बड़ा सवाल: करोड़ों खर्च हुए, तो जंगल को कितना फायदा मिला?
इंद्रावती टाइगर रिजर्व में करीब 105 करोड़ रुपये खर्च किए जाने संबंधी रिपोर्ट ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था, कार्यों के सत्यापन और सार्वजनिक धन के उपयोग पर सवाल उठाए हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में काम करना कठिन हो सकता है, लेकिन सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के बावजूद खर्च की जवाबदेही समाप्त नहीं हो जाती।
यदि विभाग के पास कार्यों के पूरे रिकॉर्ड और उनके परिणामों के प्रमाण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करने से संदेह दूर हो सकता है। यदि रिकॉर्ड में कमियां हैं या काम की वास्तविक स्थिति और भुगतान के बीच अंतर मिलता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
फिलहाल उपलब्ध अखबारी रिपोर्ट के आधार पर खर्च की राशि और कार्यों की उपयोगिता पर सवाल उठते हैं, लेकिन किसी वित्तीय घोटाले या भ्रष्टाचार को स्थापित तथ्य मानने के लिए स्वतंत्र जांच और आधिकारिक दस्तावेज जरूरी हैं। असली कसौटी यही होगी कि जंगल में खर्च किए गए करोड़ों रुपये का वास्तविक लाभ वन्यजीवों, जंगल और पर्यावरण को कितना मिला।

