
गोवा के सांता क्रूज इलाके के रहने वाले 41 वर्षीय परेश सालगांवकर ने चुनाव आयोग (ECI) की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच का रुख किया है। परेश का दावा है कि पता बदलने के लिए समय पर फॉर्म-8 जमा करने के बावजूद उनके परिवार के छह सदस्यों के नाम फाइनल वोटर लिस्ट से हटा दिए गए।
हाई कोर्ट ने जताई चिंता
मामले की सुनवाई के दौरान गोवा बेंच ने इस बात पर चिंता जताई कि कितने ऐसे योग्य मतदाता होंगे, जो इसी तरह की प्रक्रिया के कारण अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा पाए। कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह सुनिश्चित करने को कहा कि योग्य मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर न रह जाएं।
फॉर्म-8 जमा करने के बाद भी नहीं हुआ पता अपडेट
परेश के मुताबिक, उनका परिवार आठ साल से अधिक समय पहले उसी नॉर्थ गोवा निर्वाचन क्षेत्र में एक घर से दूसरे घर में शिफ्ट हुआ था। पुराना घर पार्ट नंबर 29 में और नया घर पार्ट नंबर 25 में था। SIR के दौरान उन्होंने संबंधित बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क किया। 12 नवंबर 2025 को परिवार के सदस्यों ने नए पते पर स्थानांतरण के लिए फॉर्म-8 जमा किया। परेश का कहना है कि BLO ने 8 दिसंबर को ECI पोर्टल पर आवेदन अपलोड किए जाने की जानकारी दी थी। आयोग की ओर से SMS के जरिए आवेदन प्राप्त होने की पुष्टि भी हुई।
ड्राफ्ट लिस्ट में नाम नहीं, बाद में फॉर्म-8 रिजेक्ट
16 दिसंबर को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में परेश और उनके परिवार के सदस्यों के नाम नहीं थे। उन्हें बताया गया कि फॉर्म-8 के आधार पर नाम फाइनल लिस्ट में शामिल हो जाएंगे।
हालांकि, 21 जनवरी को दावे और आपत्तियों की समयसीमा समाप्त होने के बाद उन्हें सूचना मिली कि उनके फॉर्म-8 आवेदन रिजेक्ट कर दिए गए हैं। इसके बाद फरवरी 2026 में जारी फाइनल वोटर लिस्ट में भी परिवार के नाम नहीं थे।
परेश ने फॉर्म-6 भरने पर जताई आपत्ति
परेश का कहना है कि उन्हें बताया गया कि पुराने EPIC के डिलीट होने के बाद ERONET में उसे बहाल करने का विकल्प नहीं था और उन्हें नए मतदाता के तौर पर फॉर्म-6 भरना होगा। परेश ने कहा कि वह ऐसी जानकारी देकर आवेदन नहीं करना चाहते थे, जो उनके अनुसार वास्तविक स्थिति को सही तरीके से प्रस्तुत न करे। उनका कहना है कि सॉफ्टवेयर की सीमाएं और प्रशासनिक दिशानिर्देश कानून से ऊपर नहीं हो सकते।
हाईकोर्ट ने सॉफ्टवेयर पर उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने इस बात पर सवाल उठाया कि अगर सॉफ्टवेयर किसी आवेदन को रिजेक्ट कर रहा है तो क्या अधिकारी उसके आधार पर कानूनी प्रक्रिया को रोक सकते हैं।कोर्ट ने सवाल किया कि क्या सॉफ्टवेयर कानून से ऊपर हो सकता है? अदालत ने यह भी पूछा कि प्रभावित मतदाता को सुनवाई का मौका दिए बिना नाम हटाने की अनुमति किस कानूनी प्रावधान में है। कोर्ट ने यह चिंता भी जताई कि अगर इसी तरह दूसरे लोग भी घर बदलने के कारण वोटर लिस्ट से बाहर हो गए तो बड़ी संख्या में योग्य मतदाता प्रभावित हो सकते हैं।
अब आगे क्या होगा?
मामले की सुनवाई आगे भी जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले को 5 अक्टूबर 2026 को आगे सुनने के लिए रखा है। फिलहाल अदालत ने अंतिम फैसला नहीं दिया है।

