सीजेपी के 10 अक्टूबर के प्रदर्शन पर कार्रवाई का दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में किया बचाव; हिरासत, मेट्रो बंदी और इंटरनेट प्रतिबंध को बताया कानून-व्यवस्था के लिए जरूरी कदम

नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और अन्य संगठनों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की ओर से दाखिल हलफनामे में दावा किया गया है कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन स्थल से हटाए गए लोगों को जेल या लॉकअप में नहीं रखा गया, बल्कि अस्थायी केंद्रों में रखा गया और दो से छह घंटे के भीतर छोड़ दिया गया। पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को गर्म और ताजा खाना दिया गया, जबकि हिरासत में लिए गए राजनीतिक नेताओं को पुलिस थानों में चाय-कॉफी, भोजन और अन्य जलपान उपलब्ध कराया गया।
पुलिस ने यह भी दावा किया कि कार्रवाई खुफिया जानकारी और पहले के प्रदर्शनों के अनुभव के आधार पर की गई थी। उसका कहना है कि इन कदमों का उद्देश्य दिल्ली में बड़े कानून-व्यवस्था संकट और लोगों की सुरक्षा को होने वाले संभावित नुकसान को रोकना था। हालांकि, प्रदर्शनकारियों की हिरासत, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और इंटरनेट सेवाएं रोकने को लेकर अदालत में सवाल उठे हैं।
पुलिस का दावा: किसी को जेल या लॉकअप में नहीं रखा
हलफनामे के अनुसार, प्रदर्शन स्थल से हटाए गए लोगों को अस्थायी केंद्रों में रखा गया था। पुलिस का कहना है कि उन्हें गर्म, ताजा और अच्छा खाना दिया गया तथा कुछ घंटों के भीतर जाने की अनुमति दे दी गई।
राजनीतिक नेताओं के संबंध में पुलिस ने कहा कि उन्हें थाने में थाना प्रभारी (SHO) के कमरे में बैठाया गया और उनके पद की गरिमा बनाए रखते हुए चाय, कॉफी, भोजन तथा अन्य जलपान उपलब्ध कराया गया।
पुलिस ने इन व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए हिरासत में लिए गए लोगों के साथ दुर्व्यवहार या गैरकानूनी हिरासत के आरोपों का खंडन किया है। यह पुलिस का अदालत में दिया गया पक्ष है; इससे हिरासत की वैधता को लेकर उठे कानूनी सवाल अपने आप समाप्त नहीं हो जाते।
वकीलों और पत्रकारों के काम में बाधा डालने से इनकार
दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में दावा किया कि किसी भी वकील या पत्रकार को अपना पेशेवर काम करने से नहीं रोका गया। सुप्रीम कोर्ट के पास प्रदर्शन के दौरान वकीलों को हिरासत में लिए जाने के मामले में पुलिस ने कहा कि अदालत के परिसर की गरिमा बनाए रखना जरूरी है और उसके आसपास के क्षेत्र को प्रदर्शन स्थल के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
पुलिस ने अपनी कार्रवाई के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 का हवाला दिया। यह धारा उन परिस्थितियों में निषेधात्मक आदेश जारी करने का प्रावधान करती है, जहां सार्वजनिक शांति या सुरक्षा को खतरा होने की आशंका हो।
पुलिस के अनुसार, ऐसे आदेश केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं थे, बल्कि अलग-अलग थाना क्षेत्रों में भी जारी किए गए थे। हालांकि, हलफनामे में संबंधित थानों के नामों का विवरण नहीं होने की बात रिपोर्टों में सामने आई है।
जुलाई के प्रदर्शन को आधार बनाकर कार्रवाई का बचाव
दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर की कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी के प्रदर्शन का भी हवाला दिया। पुलिस के अनुसार, उस प्रदर्शन में भीड़ नियंत्रण और कानून-व्यवस्था से जुड़ी गंभीर समस्याएं पैदा हुई थीं।
पुलिस ने आरोप लगाया कि 6 से 8 अक्टूबर के बीच कांग्रेस के विरोध मार्चों के कारण मध्य दिल्ली में यातायात प्रभावित हुआ और कई लोगों को ट्रेन या विमान पकड़ने में परेशानी हुई। इसी पृष्ठभूमि में 10 अक्टूबर के प्रदर्शन को लेकर अतिरिक्त सुरक्षा इंतजाम किए गए।
हलफनामे में यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों ने स्वतंत्र पत्रकारिता की आड़ में प्रदर्शनकारियों को उकसाया और महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी की। पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों को बसों में ले जाते समय कुछ लोगों ने बसों के टायर पंचर किए और शीशे तोड़े। इन घटनाओं के संबंध में पुलिस ने अपने हलफनामे में जो विवरण दिया है, वह उसका पक्ष है; आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग से जरूरी है।
जुलाई की हिंसा को लेकर पुलिस ने क्या कहा?
पुलिस ने 20 जुलाई के प्रदर्शन में 30 हजार से अधिक लोगों के जुटने का दावा किया। हलफनामे में आरोप लगाया गया कि भीड़ में दंगा, हत्या, दुष्कर्म और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में शामिल लोग भी मौजूद थे।
पुलिस ने वीडियो फुटेज का हवाला देते हुए दावा किया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों के सुरक्षा उपकरण हटाए, उन्हें घसीटा और हेलमेट उतारे। पुलिस के मुताबिक, इस दौरान 240 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इससे पहले पुलिस पर प्रदर्शनकारियों, खासकर महिलाओं के साथ मारपीट करने के आरोप लगाए थे। इस तरह जुलाई की घटना को लेकर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के पक्ष अलग-अलग रहे हैं।
पुलिस का कहना है कि जुलाई के अनुभव को देखते हुए अक्टूबर में एहतियाती कदम उठाए गए।

45 मेट्रो स्टेशन 25 घंटे तक बंद रखने की पुष्टि
दिल्ली में 10 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक परिवहन और संचार सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंध भी विवाद का प्रमुख मुद्दा बने। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि सुरक्षा व्यवस्था के तहत मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास पर प्रतिबंध लगाए गए थे।
पुलिस के हलफनामे के अनुसार, पहले 57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाए गए थे, जिन्हें बाद में घटाकर 45 किया गया। पुलिस ने कहा कि 10 अक्टूबर को रात 10 बजे तक मेट्रो सेवाएं सामान्य करने के निर्देश लागू कर दिए गए थे।
रेलवे के हलफनामे के संबंध में प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया कि 9 और 10 अक्टूबर के दौरान दिल्ली आने-जाने वाली लगभग 241 ट्रेनें रद्द की गई थीं। इनमें करीब 200 यात्री ट्रेनें और 41 एक्सप्रेस ट्रेनें शामिल थीं।
इन प्रतिबंधों के कारण यात्रियों को हुई असुविधा और सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के पालन को लेकर सवाल उठे।
रायसीना हिल के आसपास मोबाइल इंटरनेट बंद
केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की ओर से दाखिल हलफनामे में बताया गया कि रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे में 9 अक्टूबर रात 10 बजे से 10 अक्टूबर रात 10 बजे तक मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित की गई थीं।
सरकार ने इस कदम को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया। हलफनामे के अनुसार, ब्रॉडबैंड और वाई-फाई सेवाएं जानबूझकर चालू रखी गई थीं। यानी प्रतिबंध मोबाइल इंटरनेट पर था, सभी इंटरनेट सेवाओं पर नहीं।
सीजेपी और AISA ने क्यों बुलाया था प्रदर्शन?
सीजेपी और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को वापस लेने की मांग को लेकर प्रदर्शन बुलाया था।
प्रदर्शनकारियों और विपक्षी दलों ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने अनियमितता के आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम हटे हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत दोबारा नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
10 और 11 अक्टूबर को हुई कार्रवाई के बाद हिरासत में लिए गए लोगों, मेट्रो सेवाओं में प्रतिबंध और इंटरनेट बंद करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई थीं। अदालत ने अधिकारियों से जवाब मांगा था और सामान्य मेट्रो तथा रेल सेवाएं बहाल रखने के निर्देश दिए थे, जब तक सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक और उचित प्रतिबंध लगाने की जरूरत न हो।
सुप्रीम कोर्ट में पुलिस ने मांगी राहत
दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने हलफनामे में कहा कि पुलिस की कार्रवाई दुर्भावना से प्रेरित नहीं थी और न ही अदालत के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की गई। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अवमानना याचिका के संदर्भ में बिना शर्त माफी भी मांगी और अवमानना की कार्रवाई से राहत देने का अनुरोध किया।
इस मामले में अदालत के सामने अब दो अलग-अलग प्रश्न हैं—क्या पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए और क्या उन कदमों के दौरान अदालत के निर्देशों तथा नागरिकों के अधिकारों का पालन किया गया। पुलिस का हलफनामा उसका पक्ष प्रस्तुत करता है; अंतिम कानूनी निष्कर्ष अदालत की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।

