
बिलासपुर। घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में केवल पति को ही आरोपी बनाया जा सकता है, ऐसा जरूरी नहीं है। परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ भी घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत की जा सकती है, यदि शिकायत में घरेलू संबंध और हिंसा से जुड़े आरोप लगाए गए हों। हालांकि, आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला साक्ष्यों और गवाहों के परीक्षण के बाद ही किया जाएगा।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को एक मामले में बहू और उसके मायके पक्ष के रिश्तेदारों की याचिका खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि शिकायत की शुरुआती अवस्था में केवल इस आधार पर कार्यवाही खत्म नहीं की जा सकती कि आरोपी और शिकायतकर्ता एक ही घर में नहीं रहते। कोर्ट ने कहा कि साझा घर और घरेलू संबंध से जुड़े तथ्य साक्ष्यों के आधार पर तय किए जाने हैं।
सास और ननद ने दर्ज कराई थी शिकायत
मामले में निर्मला अग्निवंशी और श्रुति अग्निवंशी की ओर से घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत शिकायत की गई थी। शिकायत में बहू अनीशा अग्निवंशी और उसके मायके पक्ष के कुछ रिश्तेदारों को भी पक्षकार बनाया गया था।
शिकायत में शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक और मानसिक प्रताड़ना समेत दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए थे। शिकायतकर्ताओं ने राहत और मुआवजे की मांग भी की थी।
आरोपी पक्ष ने कहा- साझा घर में नहीं रहते
याचिकाकर्ताओं की ओर से हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ताओं के साथ उनका साझा घर में रहना साबित नहीं है। इसलिए घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत उनके खिलाफ कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।
मजिस्ट्रेट ने इस आपत्ति को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद सत्र न्यायालय से भी याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं मिली। दोनों स्तरों पर यह माना गया कि घरेलू संबंध और साझा घर से जुड़े तथ्य साक्ष्यों के आधार पर तय किए जाने वाले विषय हैं।
हाईकोर्ट ने कहा- आरोपों की सच्चाई ट्रायल में तय होगी
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने कहा कि शिकायत में साझा परिवार और घरेलू संबंध से जुड़े आरोप लगाए गए हैं। ऐसे में इस स्तर पर यह तय करना उचित नहीं होगा कि आरोप सही हैं या नहीं।
कोर्ट ने माना कि पक्षकारों के बीच वास्तव में घरेलू संबंध था या नहीं, साझा घर की स्थिति क्या थी और लगाए गए आरोप घरेलू हिंसा की परिभाषा में आते हैं या नहीं—इन सवालों का फैसला साक्ष्यों और गवाहों के परीक्षण के बाद किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन याचिकाकर्ताओं को ट्रायल कोर्ट के सामने अपने सभी कानूनी और तथ्यात्मक बचाव रखने की स्वतंत्रता दी।
क्या कहता है घरेलू हिंसा अधिनियम?
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 2 में ‘घरेलू संबंध’ और ‘साझा घर’ से जुड़े प्रावधान हैं। धारा 3 में शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार सहित घरेलू हिंसा की विभिन्न स्थितियों को शामिल किया गया है। धारा 12 के तहत पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत और राहत की मांग कर सकती है। LawLens
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने भी माना कि घरेलू संबंध और साझा घर की अवधारणा को केवल संकीर्ण अर्थ में नहीं देखा जा सकता। हालांकि, किसी मामले में आरोप साबित हुए हैं या नहीं, यह संबंधित मामले के साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।
महत्वपूर्ण बात
इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि हर महिला या परिवार के रिश्तेदार पर घरेलू हिंसा का मामला स्वतः चल जाएगा। कोर्ट ने इस मामले में केवल यह माना कि आरोपों और घरेलू संबंध से जुड़े विवादों को शुरुआती स्तर पर साक्ष्यों की जांच किए बिना खत्म नहीं किया जा सकता। अंतिम निर्णय ट्रायल में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।

