फ्लू डस्ट की आड़ में स्क्रैप बाहर निकालने के आरोप से खुला मामला, BSP अधिकारियों से लेकर ट्रांसपोर्टर, कारोबारी और निजी स्टील कंपनी के निदेशकों तक पहुंची जांच; CISF की सुरक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में

भिलाई। भिलाई इस्पात संयंत्र यानी BSP से कथित लोहा और स्क्रैप चोरी का मामला अब स्थानीय पुलिस जांच से आगे बढ़कर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच के रास्ते पर पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ सरकार के गृह विभाग ने 25 सितंबर 2026 को जारी राजपत्र अधिसूचना में पुरानी भिलाई थाने के अपराध क्रमांक 277/2026 की जांच के लिए दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना यानी CBI को पूरे छत्तीसगढ़ में अपनी शक्तियों और अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की सहमति दे दी है।
इस एक आदेश ने पिछले चार महीनों से चल रहे उस मामले को नया मोड़ दे दिया है, जिसमें शुरुआत एक गोदाम से करीब 250 टन लौह स्क्रैप बरामद होने से हुई थी और जांच आगे बढ़ते-बढ़ते BSP के कर्मचारियों-अधिकारियों, ट्रांसपोर्टरों, स्क्रैप कारोबारियों, एक राजनीतिक दल के पदाधिकारी और अंततः रसमड़ा स्थित एक निजी स्टील कंपनी के शीर्ष पदाधिकारियों तक पहुंची। सितंबर में पुलिस के मुताबिक गिरफ्तारियों की संख्या 21 तक पहुंच चुकी थी। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 26 मई को पकड़ा गया 250 टन स्क्रैप वास्तव में इस पूरे नेटवर्क की सिर्फ एक कड़ी थी?

1. 26 मई: दो वाहनों की जांच से खुला मामला
पूरे प्रकरण की सबसे अहम शुरुआत 26 मई 2026 से होती है।पुलिस को BSP से निकलने वाले फ्लू डस्ट को ले जाने वाले वाहनों की गतिविधियों को लेकर जानकारी मिली। जांच के दौरान ऐसे वाहनों में फ्लू डस्ट के नीचे लोहे की प्लेटें, बीम और कटिंग सामग्री मिली।
वाहन सामान्य तौर पर औद्योगिक अपशिष्ट यानी फ्लू डस्ट लेकर बाहर निकलने वाले थे, लेकिन जांच में उसके नीचे लौह सामग्री छिपी मिली। इसके बाद पुलिस ने अकलोरडीह खदानपारा स्थित AK Traders के परिसर तक जांच बढ़ाई। वहां भारी मात्रा में स्क्रैप बरामद हुआ।
पुलिस की शुरुआती कार्रवाई में करीब 250 टन लौह सामग्री जब्त की गई। स्क्रैप की अनुमानित कीमत लगभग 90 लाख रुपये बताई गई, जबकि वाहनों और मशीनरी समेत जब्त संपत्ति का कुल मूल्य करीब 3.22 करोड़ रुपये बताया गया। यहीं से मामला सामान्य स्क्रैप चोरी से निकलकर एक कथित संगठित नेटवर्क की जांच में बदलने लगा।

2. चोरी का तरीका: फ्लू डस्ट के नीचे छिपाकर निकलता था लोहा?
जांच में सामने आए विवरण के मुताबिक कथित तौर पर चोरी के लौह स्क्रैप को उन वाहनों में छिपाया जाता था, जिनका इस्तेमाल फ्लू डस्ट ले जाने के लिए किया जाता था।
यानी बाहर से वाहन औद्योगिक अपशिष्ट लेकर जाता दिखाई देता था, जबकि उसके भीतर या फ्लू डस्ट की परत के नीचे लोहे की सामग्री छिपाई जाती थी।
जांच के दौरान वाहनों के अलावा JCB, हाइड्रा क्रेन, लोडिंग उपकरण और फ्लू डस्ट से लौह सामग्री अलग करने वाली मशीनें भी जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई।
एक अन्य जांच रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुछ वाहनों में GPS से छेड़छाड़, रास्ते में GPS हटाने और बाद में दोबारा लगाने जैसी तकनीक इस्तेमाल किए जाने का संदेह सामने आया। कुछ वाहनों में अतिरिक्त या छिपे हुए हिस्से बनाए जाने की बात भी जांचकर्ताओं ने कही। ये विवरण जांच के दौरान सामने आए आरोप/आकलन हैं, जिनकी अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में होनी है।

3. पुलिस को मिला कथित नेटवर्क, बढ़ती गई गिरफ्तारियां
26 मई की कार्रवाई के बाद जांच सिर्फ गोदाम तक सीमित नहीं रही। पुलिस ने ट्रांसपोर्ट, लोडिंग, स्क्रैप की खरीद और उसे आगे खपाने की कड़ियों की जांच शुरू की। इसी क्रम में संजय सिंह को मामले का प्रमुख आरोपी बताया गया। उसके बेटे अभय सिंह का नाम भी जांच में सामने आया। इसके अलावा मोहम्मद सलीम, भास्कर मुदलियार, चिंतामणि साहू, जितेश वर्मा, निर्मल सिंह समेत कई लोगों के नाम सामने आए।
जुलाई तक गिरफ्तारियों का आंकड़ा 15 और बाद में 16 तक पहुंचा। फिर अगस्त में भाजपा के स्थानीय पदाधिकारी और स्क्रैप कारोबारी भास्कर मुदलियार की गिरफ्तारी हुई, जिससे यह मामला राजनीतिक रूप से भी चर्चा में आ गया। भाजपा ने गिरफ्तारी के बाद मुदलियार को संगठन से छह साल के लिए निष्कासित किए जाने की जानकारी दी थी
4. BSP के अंदर तक पहुंची जांच
मामले का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब जांच का दायरा BSP के अपने अधिकारियों और कर्मचारियों तक पहुंचा। जुलाई में BSP के GM हिमांशु भूषण मलिक और इंजीनियरिंग एसोसिएट मनोज कुमार देवांगन को पुलिस ने गिरफ्तार किया।
पुलिस के मुताबिक जांच में ऐसे साक्ष्य मिले जिनसे दोनों की कथित भूमिका की जांच जरूरी हुई। आरोप यह था कि प्लांट के भीतर से स्क्रैप बाहर निकालने की प्रक्रिया में अंदरूनी स्तर पर सहयोग या लापरवाही की भूमिका हो सकती है।
BSP की विभागीय कार्रवाई में हिमांशु भूषण मलिक, मनोज कुमार देवांगन और नॉन-एग्जीक्यूटिव धनंजय वर्मा को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई।
हालांकि बाद में अदालत से कुछ आरोपियों को जमानत मिल गई। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों को गलत घोषित कर दिया है; मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है।

5. आरोपियों को मिलती गई जमानत, लेकिन जांच नहीं रुकी
इस केस में गिरफ्तारियों के बाद न्यायिक प्रक्रिया भी समानांतर चलती रही। हिमांशु खंडेलवाल को अग्रिम जमानत मिली। इसके बाद पूर्व BSP GM हिमांशु भूषण मलिक को हाईकोर्ट से नियमित जमानत मिली। अगस्त में अभय सिंह को भी हाईकोर्ट से जमानत मिली। सितंबर की शुरुआत में मामले में कथित मुख्य आरोपी बताए गए संजय सिंह को भी हाईकोर्ट से जमानत मिल गई।
इसके अलावा विजेंद्र कुमार धुरिया को भी हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिली। अदालत में उनकी ओर से खुद को निर्दोष बताते हुए गलत तरीके से फंसाए जाने की दलील दी गई थी। यानी इस पूरे मामले में एक तरफ पुलिस की जांच और गिरफ्तारियां आगे बढ़ती रहीं, वहीं दूसरी तरफ अदालतों में आरोपियों को जमानत भी मिलती रही।
6. CISF की भूमिका पर क्यों उठे सवाल?
BSP देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक प्रतिष्ठानों में से एक है और उसकी सुरक्षा में CISF तैनात है।
ऐसे में सवाल स्वाभाविक रूप से उठा कि यदि चोरी का स्क्रैप कई वाहनों के जरिए प्लांट से बाहर जा रहा था, तो प्रवेश और निकासी की सुरक्षा व्यवस्था में इसे रोका क्यों नहीं गया?जांच के बाद CISF के स्तर पर भी कार्रवाई हुई। जुलाई में सात CISF जवानों को सुरक्षा में लापरवाही के आरोप में निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई। इनमें निरीक्षक, प्रधान आरक्षक और आरक्षक स्तर के कर्मचारी शामिल बताए गए। दो वरिष्ठ CISF अधिकारियों के तबादले की बात भी रिपोर्ट हुई।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है—CISF जवानों के खिलाफ हुई कार्रवाई को सीधे चोरी में उनकी संलिप्तता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उपलब्ध रिपोर्टों में निलंबन का आधार सुरक्षा में लापरवाही और विभागीय जांच बताया गया है।

7. मामला सिर्फ चोरी तक सीमित नहीं रहा, स्क्रैप की खपत की कड़ी भी सामने आई
सितंबर में जांच ने एक और महत्वपूर्ण मोड़ लिया।
पुलिस ने दावा किया कि BSP से चोरी किए गए स्क्रैप को रायपुर पावर एंड स्टील लिमिटेड, रसमड़ा स्थित औद्योगिक इकाई में खपाए जाने से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले। इसी आधार पर 18 सितंबर को कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर विनोद कुमार गर्ग और डायरेक्टर संदीप कुमार सिंह को गिरफ्तार किया गया। दोनों को अदालत में पेश कर न्यायिक रिमांड पर भेजा गया।
यह गिरफ्तारी इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे जांच का दायरा कथित चोरी करने वालों से आगे बढ़कर चोरी के माल की कथित खरीद और औद्योगिक इस्तेमाल तक पहुंच गया। सितंबर तक कुल गिरफ्तारियां 21 बताई गईं। पुलिस ने इस मामले में अदालत में चालान पेश किए जाने की जानकारी भी दी है, हालांकि नए साक्ष्यों और आगे की जांच का क्रम जारी है।

8. नेताओं की भूमिका का सवाल: क्या सामने आया, क्या सिर्फ आरोप है?
इस मामले में राजनीतिक नाम भी सामने आए।
भास्कर मुदलियार, जो स्क्रैप कारोबारी होने के साथ भाजपा के स्थानीय संगठन से जुड़े थे, गिरफ्तार किए गए। गिरफ्तारी के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।
दूसरी ओर वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने शुरुआत से ही BSP लोहा चोरी के मामले को सार्वजनिक रूप से उठाया। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर CBI जांच की मांग की थी। बाद में गृह मंत्री कार्यालय से उनका पत्र इस्पात मंत्रालय को भेजे जाने की जानकारी सामने आई।
रिकेश सेन ने बाद में इससे भी बड़े दावे किए—उन्होंने प्लांट से लंबे समय में हजारों करोड़ रुपये के लोहे की कथित चोरी, अधिकारियों-नेताओं तक कथित हिस्सेदारी और CCTV/वाहनों से जुड़े आरोप लगाए।
इन बड़े दावों को अभी स्थापित तथ्य के रूप में नहीं लिखा जा सकता। खुद एक रिपोर्ट में उनके हवाले से यह दर्ज है कि उनके पास उस समय ठोस सबूत नहीं थे और साक्ष्य सामने आने पर ही आगे की कार्रवाई की बात कही गई थी। इसलिए CBI जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यही होगा कि राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर लगाए गए इन व्यापक आरोपों में से कौन-से आरोप दस्तावेजी या आपराधिक साक्ष्यों से पुष्ट होते हैं।
9. क्या चोरी सिर्फ 250 टन तक सीमित थी?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल है।
शुरुआत में करीब 250 टन स्क्रैप की बरामदगी हुई। लेकिन बाद की जांच रिपोर्टों में पुलिस के हवाले से यह आशंका सामने आई कि यह कथित नेटवर्क इससे कहीं बड़ा हो सकता है।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने पुलिस जांच के हवाले से लिखा कि अलग-अलग गिरोहों द्वारा पिछले छह महीनों में 3,000 टन से अधिक प्रीमियम स्टील और भारी लोहे को बाहर निकालने की आशंका है और संभावित नुकसान का अनुमान करीब 17.87 करोड़ रुपये लगाया गया। यह पुलिस/जांचकर्ताओं का आकलन है, न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं।
यही वह बिंदु है जहां “250 टन बरामद” और “कितना माल वास्तव में बाहर गया?”—इन दोनों सवालों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
10. “कई सालों से चल रहा था खेल” — अभी क्या स्थिति है?
इस दावे को भी सावधानी से समझना होगा। मई-जुलाई में पुलिस के बयानों में कथित नेटवर्क के चार से पांच महीने से सक्रिय होने की बात सामने आई थी।
लेकिन जांच आगे बढ़ने पर कुछ रिपोर्टों में यह संभावना सामने आई कि चोरी का नेटवर्क अधिक समय से सक्रिय हो सकता है और 250 टन की बरामदगी सिर्फ एक हिस्सा हो सकती है।
11. अब 25 सितंबर का सबसे बड़ा मोड़: CBI को पूरे छत्तीसगढ़ में अधिकार

अब आते हैं आज सामने आए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज पर।
25 सितंबर 2026 को छत्तीसगढ़ के गृह विभाग ने राजपत्र में अधिसूचना जारी की।
इसमें दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 की धारा 6 के तहत राज्य सरकार ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना को पुरानी भिलाई थाने के अपराध क्रमांक 277/2026 की जांच के लिए पूरे छत्तीसगढ़ राज्य में शक्तियों और अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की सहमति दी है। यही वह आदेश है जिसने पूरे मामले को अब एक नए जांच चरण में पहुंचा दिया है।
इसका सीधा अर्थ क्या है?
अब इस केस की जांच के लिए CBI को छत्तीसगढ़ सरकार की औपचारिक सहमति मिल गई है।
इससे जांच का दायरा केवल पुरानी भिलाई, BSP या दुर्ग तक सीमित नहीं रहेगा। अगर जांच में रायपुर, रसमड़ा, दूसरे जिलों, दूसरे संस्थानों, परिवहन नेटवर्क या अन्य स्थानों से जुड़े साक्ष्य सामने आते हैं तो CBI उन पर भी कार्रवाई कर सकती है।
12. CBI जांच की मांग पहले ही उठ चुकी थी CBI जांच का सवाल अचानक नहीं उठा।
जुलाई में वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र भेजकर इस मामले की CBI जांच की मांग की थी। बाद में गृह मंत्री कार्यालय से पत्र इस्पात मंत्रालय को भेजे जाने की जानकारी सामने आई।
इसके अलावा अन्य राजनीतिक और सामाजिक लोगों ने भी उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई थी। इस दौरान BSP प्रबंधन और CISF की भूमिका की जांच की मांग भी सार्वजनिक रूप से सामने आई। अब सितंबर में राज्य सरकार की औपचारिक सहमति के बाद यह मांग जांच की वैधानिक प्रक्रिया तक पहुंच गई है।
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14. CBI जांच से बदल सकता है पूरे मामले का दायरा
अब तक की पुलिस जांच में जिस नेटवर्क की तस्वीर सामने आई है, उसमें एक तरफ स्क्रैप उठाने वाले और ट्रांसपोर्टर, दूसरी तरफ गोदाम और स्क्रैप कारोबारी, उसके बाद BSP के कर्मचारी/अधिकारी और अंत में कथित रूप से चोरी के माल की खरीद और औद्योगिक खपत तक की कड़ी सामने आई है।
रसमड़ा कंपनी के MD और डायरेक्टर की गिरफ्तारी ने इस chain को एक और स्तर दिया है।
अब CBI जांच का सबसे बड़ा महत्व यही है कि वह इन अलग-अलग कड़ियों को एक ही नेटवर्क का हिस्सा थीं या अलग-अलग घटनाएं, इस सवाल को साक्ष्यों के आधार पर देख सकती है।
250 टन से शुरू हुआ मामला अब सिर्फ स्क्रैप चोरी की FIR नहीं
26 मई को अकलोरडीह के एक गोदाम से करीब 250 टन लौह स्क्रैप मिलने के बाद शुरू हुई जांच चार महीने में कई गिरफ्तारियों, BSP अधिकारियों पर कार्रवाई, CISF के जवानों पर विभागीय कार्रवाई, जमानतों, निजी स्टील कंपनी के शीर्ष अधिकारियों की गिरफ्तारी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंच चुकी है।
अब 25 सितंबर का राजपत्र आदेश इस मामले का सबसे बड़ा संस्थागत मोड़ है।
स्थानीय पुलिस की जांच के बाद अब राज्य सरकार ने CBI/दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना को अपराध क्रमांक 277/2026 की जांच के लिए पूरे छत्तीसगढ़ में अधिकार क्षेत्र इस्तेमाल करने की सहमति दे दी है।
इसका मतलब यह भी है कि अब आने वाले समय में इस मामले का केंद्र सिर्फ यह नहीं रहेगा कि 250 टन लोहा कहां से चोरी हुआ और किसने निकाला, बल्कि यह भी जांच के दायरे में आ सकता है कि पूरी supply chain कितनी बड़ी थी, प्लांट के अंदर और बाहर कौन-कौन सी कड़ियां जुड़ी थीं और सार्वजनिक संपत्ति की कथित चोरी को रोकने वाली व्यवस्थाओं में वास्तविक स्तर पर क्या हुआ।
फिलहाल आरोपों का अंतिम निर्धारण अदालत और जांच के निष्कर्षों से ही होगा। गिरफ्तारी, जमानत या निलंबन अपने आप में दोष सिद्धि नहीं है।

