खेरधा बायोगैस प्लांट का ग्रामीणों द्वारा विरोध तेज़, क्या नकटी गांव जैसे बनेंगे हालात?

नारधा, खेरदा और मोहंदी के सैकड़ों ग्रामीणों ने किया विरोध, महिलाओं की बड़ी भागीदारी; चारागाह की जमीन, प्रदूषण और पूर्वजों की भूमि को लेकर उठाए सवाल। तहसीलदार के दावों पर ग्रामीणों ने जताई आपत्ति, आंदोलन के बाद प्लांट परिसर खाली करने पर सहमति बनी।

अहिवारा/दुर्ग: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के अहिवारा क्षेत्र में प्रस्तावित बायोगैस प्लांट को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया। नारधा, खेरदा और मोहंदी सहित आसपास के गांवों से पहुंचे सैकड़ों ग्रामीणों ने प्लांट स्थल पर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। ग्रामीणों ने प्रस्तावित प्लांट से पर्यावरण, खेती-किसानी, पशुओं के चारे और ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर गंभीर आशंकाएं जताईं।

ग्रामीणों का आक्रोश उस समय और बढ़ गया, जब प्लांट परिसर में भूमि पूजन का कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की गई। प्रदर्शनकारियों ने मौके पर पहुंचकर कार्यक्रम रुकवा दिया। ग्रामीणों के मुताबिक, उन्होंने परिसर में मौजूद टेंट, सजावट और कार्यक्रम से जुड़ी गाड़ियों को बाहर कराया। साथ ही प्लांट के भीतर काम कर रहे कर्मचारियों और अन्य लोगों को भी बाहर जाने के लिए कहा।

करीब तीन से चार घंटे तक चली इस ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान ग्रामीणों ने अपनी आपत्तियां, मांगें और प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े सवाल सामने रखे। विरोध के बाद बनी सहमति के अनुसार, दो दिनों के भीतर परिसर से संबंधित सामान और व्यवस्थाएं हटाने तथा फिलहाल काम नहीं करने की बात कही गई। इसी सहमति के बाद धरना समाप्त हुआ। हालांकि, इस सहमति के क्रियान्वयन और परियोजना की आगे की स्थिति पर नजर रखना जरूरी होगा।

चारागाह की जमीन को लेकर सबसे बड़ा विवाद

बायोगैस प्लांट के विरोध में ग्रामीणों का सबसे प्रमुख सवाल जमीन के उपयोग को लेकर है। उनका कहना है कि जिस जमीन पर प्लांट विकसित किया जा रहा है, उसका इस्तेमाल लंबे समय से गांवों के मवेशियों को चराने के लिए होता रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, इस जमीन से आसपास के पशुपालकों और किसानों की आजीविका जुड़ी हुई है।

प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि यदि चारागाह की जमीन पर प्लांट बनता है, तो गांवों के मवेशियों के लिए उपलब्ध चराई क्षेत्र कम हो सकता है। इससे पशुओं के चारे की व्यवस्था प्रभावित होने और पशुपालन पर निर्भर परिवारों की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ने की आशंका है।

ग्रामीणों का यह भी दावा है कि प्रस्तावित प्लांट के लिए निर्धारित जमीन में सरकारी भूमि के साथ ऐसी जमीन भी शामिल है, जिसे उनके पूर्वजों ने चारागाह के उद्देश्य से दान दिया था। कुछ ग्रामीणों ने बताया कि उनके परिवारों के पूर्वजों की जमीन भी इस क्षेत्र में शामिल है।

इसलिए ग्रामीणों की मांग केवल प्लांट के निर्माण पर आपत्ति तक सीमित नहीं है। वे जमीन के पुराने रिकॉर्ड, उसके वर्तमान राजस्व दर्जे, चारागाह के रूप में उपयोग और भूमि आवंटन की पूरी प्रक्रिया की जांच चाहते हैं।

ग्रामीणों ने प्रदूषण और स्वास्थ्य पर जताई चिंता

प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने प्लांट शुरू होने की स्थिति में संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर कई आशंकाएं व्यक्त कीं। उनका कहना है कि यदि प्लांट में बड़ी मात्रा में जैविक कचरे का प्रसंस्करण होता है, तो उससे दुर्गंध, वायु प्रदूषण और आसपास के वातावरण पर असर पड़ने की आशंका है।

ग्रामीणों ने चिंता जताई कि प्लांट से निकलने वाली दुर्गंध या अन्य उत्सर्जन का प्रभाव आसपास के खेतों, फसलों और गांवों में रहने वाले लोगों पर पड़ सकता है। उन्होंने भूजल और जलस्रोतों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठाए।

प्रदर्शनकारियों ने विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के स्वास्थ्य का मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि यदि प्लांट से किसी प्रकार का प्रदूषण फैलता है, तो इसका असर उन लोगों पर अधिक पड़ सकता है, जिनकी सेहत पहले से संवेदनशील होती है।

पूर्वजों की जमीन और भूमि आवंटन की प्रक्रिया पर सवाल

ग्रामीणों ने जमीन के स्वामित्व और आवंटन से संबंधित दस्तावेजों को लेकर भी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि जमीन का एक हिस्सा उनके पूर्वजों की ओर से चारागाह के उद्देश्य से दिया गया था और इसके बावजूद उसी क्षेत्र में प्लांट के लिए जमीन आवंटित किए जाने पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

तहसीलदार ने क्या बताया?

ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान अहिवारा के तहसीलदार राधेश्याम से भी बातचीत की गई। तहसीलदार ने जमीन को सम्मिलित चारागाह की भूमि बताया। उनके अनुसार, इस क्षेत्र में घास भूमि के साथ अलग-अलग प्रकृति की जमीन भी शामिल है। उन्होंने जमीन से संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया और अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित किए जाने की बात भी रखी।

तहसीलदार की ओर से हाईकोर्ट के आदेश का भी उल्लेख किया गया। प्रशासनिक पक्ष के अनुसार, जमीन से संबंधित कार्रवाई निर्धारित प्रक्रिया के तहत की गई है। दूसरी ओर, ग्रामीण इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और उन्हें आपत्ति दर्ज कराने के लिए मिले अवसर पर सवाल उठा रहे हैं।

अखबार में विज्ञापन प्रकाशित होने के दावे पर ग्रामीणों की आपत्ति

ग्रामीणों ने तहसीलदार की ओर से बताए गए अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित किए जाने के दावे पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि जमीन के आवंटन या प्रस्तावित गतिविधि को लेकर सार्वजनिक सूचना प्रकाशित की गई थी, तो वह ऐसे अखबारों में थी जो उनके गांवों में पहुंचते ही नहीं या जिनके बारे में स्थानीय लोगों को जानकारी नहीं थी।

ग्रामीणों का तर्क है कि जब संबंधित सूचना उन तक प्रभावी तरीके से पहुंची ही नहीं, तो वे समय रहते अपनी आपत्ति कैसे दर्ज करा सकते थे?

विरोध करने वाले ग्रामीणों पर 50 हजार रुपये के बॉन्ड की कार्रवाई का दावा

ग्रामीणों ने बताया कि इससे पहले हुए विरोध के दौरान करीब 12 से 13 लोगों से शांति भंग नहीं करने के लिए 50 हजार रुपये का बॉन्ड भरवाया गया था। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, इन लोगों में ऐसे परिवारों के सदस्य भी शामिल थे, जिनके पूर्वजों की जमीन कथित तौर पर प्रस्तावित प्लांट के लिए निर्धारित क्षेत्र में आती है।

इस कार्रवाई को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी दिखाई दी। उनका कहना है कि जमीन और चारागाह से जुड़े मुद्दे पर अपनी आपत्ति रखने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय प्रशासन को उनकी शिकायतों और जमीन से संबंधित दावों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।

कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री तक पहुंचाएंगे अपनी मांग

ग्रामीणों ने बताया कि वे इस मामले में पहले भी प्रशासनिक स्तर पर आवेदन और विरोध दर्ज करा चुके हैं। वे अपनी मांगों को लेकर कलेक्टर, सांसद विजय बघेल तक जा चुके।

ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को भी आवेदन सौंपने की बात कही है। उनके अनुसार, बानबरद में मुख्यमंत्री के प्रस्तावित कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों का एक प्रतिनिधिमंडल अपनी मांगों से संबंधित आवेदन देने का प्रयास करेगा।

ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि प्रस्तावित बायोगैस प्लांट के मामले में तत्काल हस्तक्षेप किया जाए, जमीन के रिकॉर्ड और आवंटन प्रक्रिया की जांच कराई जाए तथा चारागाह और स्थानीय लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाए। प्रदर्शन में शामिल कई ग्रामीणों ने प्लांट का निर्माण रोकने और परियोजना को दूसरी जगह स्थानांतरित करने की मांग भी की।

प्लांट परिसर में लगा है प्रतिबंधित क्षेत्र का बोर्ड

प्लांट परिसर में एक बोर्ड भी लगा हुआ है, जिसमें क्षेत्र को संरक्षित या प्रतिबंधित बताते हुए अनधिकृत प्रवेश, तोड़फोड़ अथवा नुकसान पहुंचाने जैसी गतिविधियों पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीणों का आंदोलन जमीन और सार्वजनिक हित से जुड़े सवालों पर केंद्रित है, जबकि प्रशासनिक व्यवस्था के तहत परिसर की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी आवश्यक है। पूरे विवाद का समाधान कानून के दायरे में, पारदर्शी संवाद और संबंधित दस्तावेजों की जांच के माध्यम से होना चाहिए।

भूमि पूजन का कार्यक्रम रुकवाया, परिसर खाली कराने पर बनी सहमति

विरोध के दौरान ग्रामीणों ने प्लांट परिसर में आयोजित भूमि पूजन कार्यक्रम को रोकने की मांग की और मौके पर मौजूद तैयारियों को हटाने के लिए दबाव बनाया। ग्रामीणों के अनुसार, कार्यक्रम के लिए लगाए गए टेंट, सजावट से जुड़ी सामग्री और गाड़ियों को वहां से बाहर कराया गया। प्लांट परिसर में काम कर रहे कर्मचारियों और अन्य लोगों को भी बाहर जाने के लिए कहा गया।

ग्रामीणों ने रास्ता रोककर विरोध जारी रखा। उनके मुताबिक, परिसर में मौजूद लोगों और वाहनों को बाहर जाने देने को लेकर बातचीत हुई। अंततः दो दिनों के भीतर परिसर से संबंधित सामान और व्यवस्थाएं हटाने तथा फिलहाल किसी तरह का काम नहीं करने पर सहमति बनी।

इसी सहमति के बाद प्रदर्शन समाप्त किया गया।

अब आगे क्या?

अहिवारा क्षेत्र में बायोगैस प्लांट को लेकर विवाद अब जमीन, पर्यावरण, प्रशासनिक पारदर्शिता और ग्रामीणों की सहमति जैसे कई महत्वपूर्ण सवालों में बदल चुका है। एक तरफ ग्रामीण चारागाह की जमीन, पशुओं के चारे, खेती और स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं। दूसरी तरफ प्रशासनिक पक्ष जमीन की प्रकृति, आवंटन की प्रक्रिया और संबंधित आदेशों का हवाला दे रहा है।

इस विवाद की दिशा अब इस बात पर निर्भर करेगी कि दो दिनों में परिसर खाली करने और काम रोकने को लेकर बनी सहमति का कितना पालन होता है, प्रशासन ग्रामीणों की आपत्तियों पर क्या कदम उठाता है और जमीन तथा न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज क्या बताते हैं।

रेखांकित न्यूज़ की ग्राउंड रिपोर्ट: मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने अपनी आपत्तियां और मांगें खुलकर रखीं। इस मामले में आगे होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई, ग्रामीणों के आवेदनों, जमीन से जुड़े दस्तावेजों और प्लांट की वर्तमान स्थिति पर हमारी नजर बनी रहेगी। जैसे-जैसे नए तथ्य और आधिकारिक प्रतिक्रियाएं सामने आएंगी, उन्हें भी पाठकों तक पहुंचाया जाएगा।


Nagendra sahu
Nagendra sahu
नागेन्द्र साहू छत्तीसगढ़ के भिलाई से हैं। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक (BJMC) और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (MJ) की शिक्षा प्राप्त की है। पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वीडियो एडिटिंग ( Ex- भिलाई Times Sr Editor ) और डिजिटल कंटेंट में भी विशेषज्ञता के साथ वर्तमान में रेखांकित न्यूज़ का संचालन कर रहे हैं।
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