
नई दिल्ली | 28 अक्टूबर 2026 | मीडिया, कानून और प्रेस की स्वतंत्रता
भारत के 21 प्रमुख डिजिटल समाचार प्रकाशकों ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून (DPDP Act) के कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मीडिया समूहों का कहना है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है, गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा बढ़ सकता है और जनहित में प्रकाशित खबरों को हटाने का दबाव बनाया जा सकता है।
27 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने केंद्र सरकार से इस याचिका पर जवाब मांगा। हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर विवादित प्रावधानों पर तत्काल रोक नहीं लगाई। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
यह मामला केवल मीडिया संस्थानों और डेटा संरक्षण कानून के बीच कानूनी विवाद नहीं है। इसके केंद्र में एक बड़ा सवाल है: निजता की रक्षा करते हुए पत्रकारों को भ्रष्टाचार, सत्ता, कारोबार और सार्वजनिक संस्थानों से जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच करने की कितनी गुंजाइश मिलनी चाहिए?
मीडिया समूहों की मुख्य आपत्ति क्या है?
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत में दलील दी कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट न होने से समाचार जुटाने और प्रकाशित करने की मौजूदा प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
मीडिया समूहों के अनुसार, किसी व्यक्ति की निजी जानकारी के इस्तेमाल से संबंधित सहमति की शर्त को पत्रकारिता पर लागू करने से कई व्यावहारिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी पत्रकार को भ्रष्टाचार या कारोबारी अनियमितताओं की जांच के दौरान उसी व्यक्ति से सहमति लेनी पड़े, जिसके खिलाफ जांच की जा रही है, तो संबंधित व्यक्ति को पहले ही जांच की जानकारी मिल सकती है।
DNPA का तर्क है कि ऐसी स्थिति में दस्तावेज नष्ट किए जाने, गवाहों पर दबाव डालने या जांच से जुड़े साक्ष्यों को प्रभावित करने का जोखिम बढ़ सकता है।
“अनुमति लेकर खबर प्रकाशित करनी पड़ी तो यह पूर्व-सेंसरशिप जैसा होगा”
अदालत में DNPA की ओर से यह आशंका जताई गई कि यदि पत्रकारों को रिपोर्टिंग से पहले संबंधित व्यक्तियों की सहमति पर निर्भर रहना पड़े, तो स्वतंत्र समाचार संकलन की अवधारणा बदल सकती है।
माधवी दीवान ने दलील दी कि ऐसी व्यवस्था खोजी पत्रकारिता और समय-संवेदनशील खबरों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। उनके मुताबिक, पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट के अभाव में न्यूजरूम के कामकाज पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि, यह मीडिया समूहों की ओर से अदालत में रखी गई दलील है। कानून का वास्तविक प्रभाव और उसके प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है।
गोपनीय सूत्रों और व्हिसलब्लोअर की सुरक्षा पर चिंता
खोजी पत्रकारिता अक्सर ऐसे लोगों से मिली जानकारी पर निर्भर करती है, जो भ्रष्टाचार, सरकारी अनियमितताओं या कंपनियों के कथित गलत कामों के बारे में अंदरूनी जानकारी देते हैं। इनमें कर्मचारी, अधिकारी, गवाह और व्हिसलब्लोअर शामिल हो सकते हैं।
DNPA ने अदालत में चिंता जताई कि कानून के तहत अधिकारियों को संगठनों से व्यक्तिगत डेटा या अन्य जानकारी मांगने की जो शक्तियां मिलती हैं, उनका इस्तेमाल पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों तक पहुंचने के लिए हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे सूचना देने वाले लोगों की पहचान उजागर होने का डर बढ़ सकता है। नतीजतन, भविष्य में लोग सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में पत्रकारों को जानकारी देने से हिचक सकते हैं।
यह चिंता खास तौर पर उन रिपोर्टों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिनमें सत्ता, सरकारी निर्णयों, चुनावी प्रक्रियाओं या बड़े कारोबारी समूहों की जवाबदेही की जांच की जाती है।
खबर हटाने या उसमें बदलाव करने का दबाव पड़ने की आशंका
मीडिया समूहों ने कानून के तहत व्यक्तिगत डेटा हटाने और सहमति वापस लेने से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं।
उनका तर्क है कि यदि किसी खबर में उल्लेखित व्यक्ति बाद में अपनी सहमति वापस ले ले या निजी जानकारी हटाने की मांग करे, तो समाचार संस्थानों पर पहले से प्रकाशित सामग्री हटाने या उसमें व्यापक बदलाव करने का दबाव पड़ सकता है।
DNPA के अनुसार, जनहित में प्रकाशित और तथ्यात्मक रूप से सही रिपोर्टों के मामले में ऐसा होने से सार्वजनिक रिकॉर्ड और खोजी पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, डेटा संरक्षण कानून का व्यापक उद्देश्य लोगों की व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग को रोकना और निजता की रक्षा करना है। इसलिए विवाद का मूल प्रश्न यह है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और जनहित में रिपोर्टिंग के बीच उचित संतुलन किस तरह बनाया जाए।
RTI कानून में बदलाव को भी चुनौती
DNPA की याचिका केवल DPDP Act तक सीमित नहीं है। इसमें सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की धारा 8(1)(j) में किए गए संशोधन को भी चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण पर लागू छूट का दायरा बढ़ने से सार्वजनिक अधिकारियों और सार्वजनिक महत्व के मामलों से संबंधित जानकारी हासिल करना कठिन हो सकता है। इससे पत्रकारों की सूचना तक पहुंच और सार्वजनिक जवाबदेही पर असर पड़ने की आशंका है।
RTI और डेटा संरक्षण के बीच यह टकराव महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक ओर नागरिकों की निजी जानकारी की रक्षा जरूरी है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक पदों और सरकारी कामकाज से जुड़े मामलों में पारदर्शिता भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है।
याचिका में किन मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व है?
DNPA की याचिका में 21 प्रमुख समाचार प्रकाशकों के डिजिटल कारोबार का प्रतिनिधित्व है। इनमें नेटवर्क18, NDTV, द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट, द हिंदू, इंडिया टुडे ग्रुप, जी मीडिया, ABP, मलयाला मनोरमा, माथृभूमि, अमर उजाला और ईनाडु टेलीविजन जैसे मीडिया समूह शामिल हैं।
याचिका में DPDP Act, 2023 के नौ प्रावधानों और DPDP Rules, 2025 के तीन नियमों को चुनौती दी गई है। स्वतंत्र खोजी पत्रकार युक्ता मुडगल भी इस कानूनी चुनौती में याचिकाकर्ता हैं।
इस मामले की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है कि इसमें अलग-अलग संपादकीय रुझान और कारोबारी पृष्ठभूमि रखने वाले मीडिया संस्थान एक साझा कानूनी मुद्दे पर साथ आए हैं।
केंद्र सरकार का पक्ष और अदालत के सामने चुनौती
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से याचिका पर जवाब मांगा है, लेकिन तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया। सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिया कि नागरिकों की निजता और प्रेस की स्वतंत्रता—दोनों अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है।
केंद्र सरकार का विस्तृत जवाब और अदालत में आगे होने वाली सुनवाई यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होगी कि कानून के प्रावधानों को पत्रकारिता पर किस सीमा तक लागू किया जा सकता है और क्या अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की जरूरत है।
DPDP कानून और उसके नियमों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना है। समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, संबंधित प्रावधानों का बड़ा हिस्सा मई 2027 से प्रभावी होने वाला है।
17 नवंबर की सुनवाई पर टिकी नजरें
अब सुप्रीम कोर्ट में 17 नवंबर 2026 को होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। अदालत के सामने एक ओर व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग से नागरिकों को बचाने की जरूरत है, तो दूसरी ओर यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि जनहित में तथ्य जुटाने और उन्हें प्रकाशित करने की पत्रकारों की क्षमता अनावश्यक रूप से बाधित न हो।
फिलहाल, कानून पर रोक नहीं लगी है और याचिका पर अंतिम फैसला भी नहीं आया है। इसलिए इसे पत्रकारिता पर पूर्ण प्रतिबंध या कानून के रद्द होने के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। आगे का फैसला यह तय करने में अहम हो सकता है कि भारत में डेटा संरक्षण और खोजी पत्रकारिता के बीच कानूनी सीमाएं किस तरह निर्धारित होंगी।

