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पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) को अब केवल अंडाशय यानी ओवरी से जुड़ी समस्या के रूप में नहीं, बल्कि हार्मोनल और मेटाबॉलिक बदलावों से जुड़ी एक जटिल स्थिति के रूप में समझा जाता है। यह महिलाओं के मासिक धर्म, ओव्यूलेशन, त्वचा, बालों की वृद्धि और प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ ही कुछ महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज, असामान्य कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर और स्लीप एपनिया का जोखिम भी बढ़ सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, प्रजनन आयु की लगभग 10–13% महिलाएं PCOS से प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि, इसके लक्षण हर महिला में एक जैसे नहीं होते और कुछ मामलों में इसका पता भी नहीं चल पाता।
PCOS में शरीर के भीतर क्या बदलता है?
PCOS में हार्मोन के संतुलन और अंडाशय के सामान्य कामकाज में बदलाव हो सकते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:
- मासिक धर्म का अनियमित होना या लंबे अंतराल पर आना।
- पुरुष हार्मोन कहे जाने वाले एंड्रोजन का स्तर बढ़ना।
- चेहरे पर मुंहासे और शरीर या चेहरे पर अधिक बाल उगना।
- ओव्यूलेशन यानी अंडे के रिलीज होने की प्रक्रिया में गड़बड़ी।
- गर्भधारण करने में कठिनाई।
इनमें से सभी लक्षण हर व्यक्ति में मौजूद हों, यह जरूरी नहीं है। इसलिए केवल अनियमित पीरियड्स, मुंहासों या अल्ट्रासाउंड में दिखाई देने वाले बदलावों के आधार पर स्वयं PCOS का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
इंसुलिन रेजिस्टेंस से कैसे जुड़ा है PCOS?
PCOS की प्रमुख विशेषताओं में से एक इंसुलिन रेजिस्टेंस है। इंसुलिन वह हार्मोन है, जो रक्त में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। जब कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति सामान्य प्रतिक्रिया नहीं देतीं, तो शरीर को रक्त शर्करा नियंत्रित करने के लिए अधिक इंसुलिन बनाना पड़ सकता है।
कुछ महिलाओं में इंसुलिन का बढ़ा हुआ स्तर एंड्रोजन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। इससे हार्मोनल असंतुलन और ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि, हर PCOS से प्रभावित महिला में इंसुलिन रेजिस्टेंस होना जरूरी नहीं है। PCOS के पीछे आनुवंशिक, हार्मोनल और पर्यावरणीय कारकों की भूमिका हो सकती है। इसकी गंभीरता और लक्षण भी अलग-अलग हो सकते हैं।
डायबिटीज और हृदय संबंधी जोखिम पर भी ध्यान जरूरी
PCOS का संबंध केवल प्रजनन स्वास्थ्य से नहीं है। इससे प्रभावित महिलाओं में कुछ मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है, जिनमें शामिल हैं:
- टाइप-2 डायबिटीज।
- कोलेस्ट्रॉल के स्तर में गड़बड़ी।
- हाई ब्लड प्रेशर।
- स्लीप एपनिया यानी नींद के दौरान सांस लेने में बार-बार रुकावट।
इन जोखिमों का अर्थ यह नहीं है कि PCOS से प्रभावित हर महिला को ये बीमारियां होंगी। लेकिन यह स्थिति नियमित स्वास्थ्य जांच और लंबे समय तक मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित करती है।
डॉक्टर जरूरत के अनुसार रक्त शर्करा, लिपिड प्रोफाइल, ब्लड प्रेशर और अन्य स्वास्थ्य संकेतकों की जांच की सलाह दे सकते हैं।
क्या PCOS से गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है?
PCOS में ओव्यूलेशन अनियमित होने के कारण गर्भधारण में कठिनाई हो सकती है। यही वजह है कि इसे महिलाओं में ओव्यूलेशन से जुड़ी बांझपन की प्रमुख वजहों में गिना जाता है।
लेकिन PCOS का मतलब यह नहीं है कि महिला गर्भधारण नहीं कर सकती। कई महिलाएं प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करती हैं, जबकि कुछ को चिकित्सकीय सहायता की जरूरत पड़ सकती है।
उपचार का चुनाव महिला के लक्षणों, उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और गर्भधारण की योजना के आधार पर किया जाता है। इसलिए प्रजनन संबंधी समस्याओं में स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना महत्वपूर्ण है।
PCOS के उपचार में केवल पीरियड्स नियमित करना पर्याप्त नहीं
2023 में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय साक्ष्य-आधारित दिशानिर्देश PCOS की देखभाल के लिए व्यापक दृष्टिकोण पर जोर देते हैं। इसमें केवल मासिक धर्म या प्रजनन संबंधी लक्षणों का उपचार ही नहीं, बल्कि मेटाबॉलिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना शामिल है।
- देखभाल में जरूरत के अनुसार निम्न पहलुओं पर काम किया जा सकता है:
- संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि।
- रक्त शर्करा, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर की निगरानी।
- अनियमित मासिक धर्म, मुंहासों या अधिक बालों की वृद्धि का उपचार।
- गर्भधारण की योजना के अनुसार प्रजनन संबंधी उपचार।
- तनाव, चिंता और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान।
किसी भी दवा या हार्मोनल उपचार का चुनाव डॉक्टर की सलाह से करना चाहिए। PCOS के सभी मामलों के लिए एक ही उपचार उपयुक्त नहीं होता।
PCOS को समझने के लिए समग्र नजरिया जरूरी
वैज्ञानिक समझ के अनुसार, PCOS को केवल प्रजनन संबंधी बीमारी या केवल मेटाबॉलिक विकार कहना इसकी जटिलता को कम करके आंकना होगा। यह शरीर की कई आपस में जुड़ी प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए समय पर पहचान, लक्षणों के अनुरूप उपचार और लंबे समय तक स्वास्थ्य की निगरानी महत्वपूर्ण है। सही चिकित्सकीय देखभाल से इसके कई लक्षणों और संबंधित जोखिमों को प्रभावी ढंग से संभाला जा सकता है।
स्रोत: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO); 2023 International Evidence-Based Guideline for the Assessment and Management of Polycystic Ovary Syndrome; Monash University.

