बिना कागजात मवेशी ले जाना वध की मंशा साबित नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि रद्द की

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32 बैलों को छत्तीसगढ़ से ओडिशा ले जाने के मामले में फैसला; कोर्ट ने कहा- अभियोजन को पहले वध के लिए परिवहन या आरोपी की जानकारी साबित करनी होगी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मवेशियों को परिवहन के दौरान जरूरी दस्तावेजों का साथ नहीं होना, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उन्हें वध के लिए ले जाया जा रहा था। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम, 2004 के तहत दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि मवेशियों का परिवहन वध के उद्देश्य से किया जा रहा था या आरोपी को इस बात की जानकारी थी कि उन्हें वध के लिए ले जाया जा सकता है।

यह फैसला सौरभ बजाज बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य मामले में 29 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार मामला Criminal Appeal No. 4666/2026 से संबंधित है और अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया।

32 बैलों को छत्तीसगढ़ से ओडिशा ले जाने का मामला

मामला 32 बैलों को छत्तीसगढ़ के केड़ुवा से ओडिशा की ओर ले जाने से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, सूचना मिलने के बाद एक हेड कांस्टेबल ने एक ट्रक को रोका, जिसमें 32 बैल ले जाए जा रहे थे। ट्रक के चालक और क्लीनर को गिरफ्तार किया गया। ट्रक के आगे चल रही एक बोलेरो को भी रोका गया, जिसमें सवार लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। सौरभ बजाज उन छह आरोपियों में शामिल थे जिन्हें इस मामले में दोषी ठहराया गया था।

अभियोजन का आरोप था कि मवेशियों को छत्तीसगढ़ से ओडिशा ले जाने के लिए आवश्यक दस्तावेज आरोपियों के पास नहीं थे। इसी आधार पर छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की गई थी। निचली अदालत से दोषसिद्धि के बाद मामला अपीलीय और पुनरीक्षण स्तर तक गया, जहां दोषसिद्धि बरकरार रही। बाद में आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

दस्तावेज नहीं होना और वध की मंशा अलग-अलग बातें

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही कि परिवहन दस्तावेजों का अभाव अपने आप में वध के उद्देश्य का प्रमाण नहीं है। अदालत के अनुसार, यदि परिवहन से जुड़े किसी अन्य कानून के तहत दस्तावेज नहीं होने पर कोई उल्लंघन बनता है, तो उसके लिए संबंधित कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन केवल इस आधार पर छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम के तहत यह मान लेना उचित नहीं है कि मवेशियों को वध के लिए ले जाया जा रहा था।

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष को पहले कथित अपराध के आवश्यक तत्वों को प्रमाणित करना होता है। इसके बाद ही कानून में मौजूद आरोपी पर प्रतिकूल भार या reverse burden of proof का प्रावधान लागू किया जा सकता है। यानी केवल संदेह, परिस्थितियों या दस्तावेजों की अनुपस्थिति के आधार पर अभियोजन अपनी शुरुआती जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

पशु चिकित्सक और गौशाला समिति के प्रमुख की गवाही भी अहम

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में मवेशियों की स्थिति से जुड़े साक्ष्य को भी महत्वपूर्ण माना। रिकॉर्ड के अनुसार, पशु चिकित्सक और गौशाला समिति के अध्यक्ष ने अदालत में कहा था कि जब्त किए गए मवेशी स्वस्थ थे और कृषि कार्यों, जैसे हल चलाने, के लिए उपयुक्त थे।

अदालत ने इस तथ्य को अभियोजन के उस दावे के संदर्भ में देखा कि मवेशियों को वध के लिए ले जाया जा रहा था। जब उपलब्ध साक्ष्यों से वध की मंशा या आरोपी के ऐसे उद्देश्य की जानकारी साबित नहीं हुई, तो केवल दस्तावेजों की अनुपस्थिति के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखना उचित नहीं माना गया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या स्पष्ट किया?

इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि मवेशियों को बिना जरूरी दस्तावेजों के परिवहन करना कानूनी रूप से स्वतः वैध हो गया है। अदालत का फैसला विशेष रूप से इस सवाल से जुड़ा है कि क्या दस्तावेजों की अनुपस्थिति को मवेशियों को वध के लिए ले जाने की मंशा का स्वतः प्रमाण माना जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने इसका जवाब नकारात्मक दिया। अदालत ने कहा कि छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को यह स्थापित करना होगा कि मवेशियों का परिवहन वध के लिए था या आरोपी को उनके वध की संभावना की जानकारी थी। केवल परिवहन दस्तावेजों का नहीं होना इस आवश्यक तत्व को साबित नहीं करता।

दोषसिद्धि और सजा रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन द्वारा आवश्यक तत्व साबित न किए जाने के कारण सौरभ बजाज की दोषसिद्धि को बरकरार रखने का आधार नहीं पाया। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए संबंधित निचली अदालतों के दोषसिद्धि और सजा के आदेशों को उनके संबंध में रद्द कर दिया।

फैसले का मूल कानूनी संदेश यह है कि किसी विशेष अपराध की सजा के लिए उस अपराध के आवश्यक तत्वों का प्रमाण जरूरी है। मवेशियों के परिवहन से जुड़े दस्तावेजों की कमी अपने आप में वध की मंशा का प्रमाण नहीं बन सकती। इस मामले में उपलब्ध पशु चिकित्सकीय और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन के मामले को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना।

Nagendra sahu
Nagendra sahu
नागेन्द्र साहू छत्तीसगढ़ के भिलाई से हैं। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक (BJMC) और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (MJ) की शिक्षा प्राप्त की है। पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वीडियो एडिटिंग ( Ex- भिलाई Times Sr Editor ) और डिजिटल कंटेंट में भी विशेषज्ञता के साथ वर्तमान में रेखांकित न्यूज़ का संचालन कर रहे हैं।
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