भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, पाटन चुनाव याचिका पर 5 अक्टूबर को हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

हाईकोर्ट ने भूपेश बघेल की चुनाव याचिका खारिज करने वाली अर्जी भी ठुकराई; 45 दिन की समय-सीमा और याचिका की वैधता का सवाल फिलहाल ट्रायल के साथ आगे बढ़ेगा

पाटन चुनाव याचिका मामले में भूपेश बघेल और विजय बघेल
पाटन विधानसभा चुनाव से जुड़ी चुनाव याचिका में 5 अक्टूबर 2026 को विजय बघेल और उनके गवाहों के साक्ष्य दर्ज किए जाएंगे।

बिलासपुर। पाटन विधानसभा चुनाव को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और भाजपा सांसद विजय बघेल के बीच चल रही कानूनी लड़ाई अब साक्ष्य के अगले चरण में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा भूपेश बघेल की विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज किए जाने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी 17 सितंबर 2026 को उनकी ओर से दाखिल एक और आवेदन को खारिज कर दिया। अब चुनाव याचिका पर 5 अक्टूबर 2026 को विजय बघेल और उनके गवाहों के साक्ष्य दर्ज किए जाएंगे।

मामला 2023 के पाटन विधानसभा चुनाव से जुड़ा है, जिसमें भूपेश बघेल निर्वाचित हुए थे और विजय बघेल भाजपा प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में थे। विजय बघेल ने भूपेश बघेल के निर्वाचन को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की थी। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में यह मामला Election Petition No. 3 of 2024 के रूप में दर्ज है।

क्या है चुनाव याचिका का मामला?

विजय बघेल की चुनाव याचिका में मुख्य आरोप चुनाव प्रचार के लिए निर्धारित 48 घंटे की मौन अवधि के कथित उल्लंघन से जुड़ा है।

पाटन विधानसभा क्षेत्र में 17 नवंबर 2023 को मतदान होना था। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत मतदान समाप्त होने से पहले के 48 घंटे की अवधि में चुनाव से संबंधित सार्वजनिक सभा, जुलूस या चुनावी प्रचार पर रोक रहती है। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार यह अवधि 15 नवंबर 2023 शाम 5 बजे से शुरू हुई थी।

विजय बघेल की याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस अवधि के दौरान भूपेश बघेल की ओर से एक रैली/रोड शो किया गया, जिसमें उनके और कांग्रेस के समर्थन में नारे लगाए गए तथा मतदाताओं से समर्थन की अपील की गई।

याचिका में इस कथित कार्यक्रम की मोबाइल फोन से वीडियो रिकॉर्डिंग और तस्वीरें होने का भी दावा किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि घटना की जानकारी चुनाव से जुड़े अधिकारियों को दी गई थी।

भूपेश बघेल ने इन आरोपों से इनकार किया है और चुनाव याचिका की वैधता तथा उसमें लगाए गए आरोपों पर आपत्तियां उठाई हैं। इसलिए इन आरोपों को फिलहाल अदालत में साबित तथ्य नहीं, बल्कि चुनाव याचिका में लगाए गए आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

भूपेश बघेल ने याचिका को शुरुआत में ही खत्म करने की मांग क्यों की?

मामले की सुनवाई के दौरान भूपेश बघेल की ओर से कई कानूनी आपत्तियां उठाई गईं। उनका एक प्रमुख तर्क यह रहा कि चुनाव याचिका कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती और इसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जाना चाहिए।

बाद में उनकी ओर से CPC के Order VII Rule 11 के तहत भी आवेदन दिया गया। इस प्रावधान के तहत कुछ परिस्थितियों में किसी याचिका को शुरुआती चरण में ही खारिज करने की मांग की जा सकती है।
मामले में यह सवाल भी उठाया गया कि चुनाव याचिका निर्धारित 45 दिन की वैधानिक समय-सीमा में सही तरीके से पेश हुई थी या नहीं।

45 दिन की समय-सीमा का विवाद क्या है?

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 81(1) के अनुसार चुनाव परिणाम को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका निर्धारित समय-सीमा में दाखिल की जानी होती है। पाटन विधानसभा चुनाव का परिणाम 3 दिसंबर 2023 को घोषित हुआ था। इस हिसाब से 45 दिन की अवधि

17 जनवरी 2024 को समाप्त होती थी।

17 सितंबर के हाईकोर्ट आदेश में भूपेश बघेल की ओर से यही तर्क रखा गया कि चुनाव याचिका की वैधानिक प्रस्तुति को लेकर सवाल है। उनके पक्ष ने कहा कि याचिका के सत्यापन और शपथपत्र की तारीख 22 जनवरी 2024 है और रजिस्ट्री में इसका पंजीकरण 24 जनवरी 2024 को हुआ। इस आधार पर याचिका को समय-सीमा से बाहर बताते हुए खारिज करने की मांग की गई।

दूसरी ओर विजय बघेल की ओर से कहा गया कि केवल रजिस्ट्री में बाद की तारीख में पंजीकरण होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि याचिका समय पर पेश नहीं हुई थी। याचिका कब और किस रूप में अदालत के सामने पेश की गई, उस समय कौन-सी आपत्तियां थीं और बाद में उन कमियों को कैसे दूर किया गया—इन सवालों की जांच रिकॉर्ड और साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।

17 सितंबर को हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने 17 सितंबर 2026 को भूपेश बघेल की ओर से दाखिल आवेदन को खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि केवल यह देखकर कि चुनाव याचिका बाद में रजिस्टर्ड हुई, यह तय नहीं किया जा सकता कि वह समय-सीमा के बाहर थी। यह भी देखना जरूरी है कि याचिका मूल रूप से कब पेश की गई थी, उस समय क्या कमियां थीं और उन कमियों की कानूनी प्रकृति क्या थी।

अदालत ने यह भी कहा कि इस स्तर पर याचिका की वैधता से जुड़े इन सवालों का पूरा निर्धारण रिकॉर्ड और साक्ष्यों के आधार पर किया जाना उचित होगा।

इसी वजह से Order VII Rule 11 के तहत चुनाव याचिका को खारिज करने की मांग स्वीकार नहीं की गई। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल इस अंतरिम आवेदन तक सीमित हैं और चुनाव याचिका का अंतिम फैसला स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर होगा।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ था?

हाईकोर्ट के 15 जून 2026 के आदेश के बाद भूपेश बघेल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। मामला SLP (C) No. 24440/2026 के रूप में सामने आया।
7 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस SLP को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर खत्म करने की मांग में हस्तक्षेप नहीं किया और भूपेश बघेल को अपने कानूनी तर्क उचित चरण पर हाईकोर्ट के समक्ष रखने की स्वतंत्रता दी। सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में यह भी सामने आया कि कथित चुनावी उल्लंघन का चुनाव परिणाम पर वास्तविक प्रभाव पड़ा या नहीं, यह सवाल साक्ष्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए।

इसका मतलब यह नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट ने विजय बघेल के आरोपों को सही मान लिया। अदालत ने केवल चुनाव याचिका को शुरुआती स्तर पर खत्म करने से इनकार किया और मामले को आगे न्यायिक प्रक्रिया में जाने दिया।

अब 5 अक्टूबर को क्या होगा?

17 सितंबर के हाईकोर्ट आदेश में साफ तौर पर चुनाव याचिका को 5 अक्टूबर 2026 को साक्ष्य दर्ज करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

अदालत ने चुनाव याचिकाकर्ता विजय बघेल को खुद और अपने गवाहों को उपस्थित रखने का निर्देश दिया है।

इसका अर्थ है कि अब मामला प्रारंभिक आपत्तियों से आगे बढ़कर evidence stage में रहेगा। विजय बघेल की ओर से पेश किए जाने वाले साक्ष्य, दस्तावेज और गवाहों के बयान रिकॉर्ड पर आएंगे। इसके बाद प्रतिपक्ष को जिरह का अवसर मिलेगा और आगे अन्य साक्ष्यों की प्रक्रिया चलेगी।

पहले भी दर्ज हो चुके हैं गवाहों के शपथपत्र

इस मामले में साक्ष्य की प्रक्रिया पूरी तरह नई नहीं है। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार विजय बघेल और उनके तीन अन्य गवाहों के मुख्य परीक्षण के शपथपत्र पहले ही दाखिल किए जा चुके हैं।

18 मार्च 2025 को विजय बघेल की जिरह शुरू भी हुई थी, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में मोबाइल फोन और ई-मेल की प्रति की स्वीकार्यता से जुड़ा सवाल सामने आने के बाद प्रक्रिया रुक गई थी।

बाद में भूपेश बघेल की ओर से प्रारंभिक स्तर पर चुनाव याचिका को खारिज करने के लिए आवेदन दाखिल किया गया और मामला उस कानूनी सवाल पर चला गया। अब 17 सितंबर के आदेश के बाद साक्ष्य की कार्यवाही फिर आगे बढ़ने जा रही है।

कोर्ट ने अभी चुनाव परिणाम पर कोई फैसला नहीं दिया

यह इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
हाईकोर्ट ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि:
विजय बघेल द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं;
कथित रैली या रोड शो वास्तव में धारा 126 का उल्लंघन था;
कथित उल्लंघन का चुनाव परिणाम पर प्रभाव पड़ा;

भूपेश बघेल का निर्वाचन रद्द किया जाना चाहिए।
17 सितंबर का आदेश केवल भूपेश बघेल की प्रारंभिक अर्जी को खारिज करने से संबंधित है। चुनाव याचिका पर अंतिम फैसला अभी बाकी है। अदालत ने खुद स्पष्ट किया है कि अंतिम निर्णय pleadings, evidence और रिकॉर्ड के आधार पर स्वतंत्र रूप से किया जाएगा।

अब मामले की नजर 5 अक्टूबर पर

पाटन विधानसभा चुनाव से जुड़ी यह कानूनी लड़ाई अब एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट से SLP में राहत नहीं मिलने और हाईकोर्ट द्वारा 17 सितंबर को प्रारंभिक आपत्ति खारिज किए जाने के बाद चुनाव याचिका आगे बढ़ रही है।

अब 5 अक्टूबर 2026 को विजय बघेल और उनके गवाहों के साक्ष्य दर्ज होना इस मामले की अगली बड़ी कार्यवाही होगी। इसके बाद जिरह, अन्य साक्ष्य और कानूनी दलीलों के चरण आएंगे। अंतिम फैसला किसके पक्ष में होगा या भूपेश बघेल का निर्वाचन बरकरार रहेगा अथवा नहीं—इस पर अभी कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। फिलहाल अदालत के सामने मामला साक्ष्य और ट्रायल की प्रक्रिया में है।

Nagendra sahu
Nagendra sahu
नागेन्द्र साहू छत्तीसगढ़ के भिलाई से हैं। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक (BJMC) और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (MJ) की शिक्षा प्राप्त की है। पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वीडियो एडिटिंग ( Ex- भिलाई Times Sr Editor ) और डिजिटल कंटेंट में भी विशेषज्ञता के साथ वर्तमान में रेखांकित न्यूज़ का संचालन कर रहे हैं।
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