उत्तराखंड से दिल्ली तक का सफर, DU और आंबेडकर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के बाद JNU में PhD; AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर जंतर-मंतर से झारखंड और अब CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलनों तक सक्रिय

नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2026। पिछले कुछ महीनों में देश के छात्र और युवा आंदोलनों में कुछ चेहरे तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए हैं। इनमें नेहा बोरा का नाम भी प्रमुखता से सामने आया है। दिल्ली की छात्र राजनीति से सक्रियता शुरू करने वाली नेहा अब ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और हाल के कई छात्र एवं युवा आंदोलनों में अग्रिम पंक्ति में दिखाई दी हैं। अगस्त में Indian Express ने उन्हें देशभर में फैल रहे विरोध प्रदर्शनों के प्रमुख चेहरों में से एक बताया था।
उनकी राजनीतिक यात्रा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि नेहा खुद बता चुकी हैं कि उनका परिवार बीजेपी समर्थक रहा है। इसके बावजूद दिल्ली आने के बाद उन्होंने वामपंथी छात्र राजनीति को अपनी राह चुना। अपने इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनकी राजनीतिक सक्रियता को लेकर परिवार में लंबे समय से मतभेद रहे हैं।
जुलाई के आंदोलन से राष्ट्रीय पहचान
2026 में शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर दिल्ली में हुए छात्र आंदोलनों ने नेहा बोरा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। जंतर-मंतर पर चले आंदोलन में उन्होंने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल में भी हिस्सा लिया।

Indian Express के अगस्त में प्रकाशित इंटरव्यू के मुताबिक, नेहा जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के साथ 23 दिन की भूख हड़ताल में शामिल रही थीं। इसी दौर में AISA की भूमिका और छात्र आंदोलन के भीतर उनके सक्रिय हस्तक्षेप की चर्चा बढ़ी।
इसके बाद वह झारखंड में छात्रों और नौकरी की परीक्षाओं से जुड़े विरोध प्रदर्शन में भी पहुंचीं। रांची में एक प्रदर्शन के दौरान उनके चेहरे पर स्याही फेंके जाने की घटना सामने आई। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि इस तरह की घटनाओं से वह डरने वाली नहीं हैं।
रांची में स्याही फेंके जाने के बाद भी पीछे नहीं हटीं
रांची में प्रदर्शन के दौरान नेहा पर स्याही फेंके जाने की घटना के बाद भी उन्होंने अपना विरोध जारी रखा। उनके मुताबिक, आंदोलनकारियों को डराकर छात्र मुद्दों को दबाया नहीं जा सकता।
बाद में दिए इंटरव्यू में उन्होंने इस घटना को लेकर अपने खिलाफ चलाए गए राजनीतिक विरोध पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलनों में व्यक्ति से ज्यादा मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

दिल्ली से बिहार तक छात्र आंदोलनों में सक्रियता
नेहा की सक्रियता केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रही। परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर बिहार और झारखंड में हुए छात्र आंदोलनों में भी वह पहुंचीं।
उनकी राजनीति का बड़ा हिस्सा शिक्षा, छात्र अधिकार, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों के इर्द-गिर्द दिखाई देता है। AISA के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर वह छात्र संगठनों के कार्यक्रमों और आंदोलनों में लगातार सक्रिय रही हैं।
इसी सक्रियता ने उन्हें सोशल मीडिया पर भी चर्चा में ला दिया। उनके भाषणों के छोटे वीडियो और प्रदर्शन के दौरान दिए गए बयान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में शेयर किए जाते रहे हैं।

कौन हैं नेहा बोरा?
नेहा बोरा मूल रूप से उत्तराखंड की रहने वाली हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और इसके बाद आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली से मास्टर डिग्री हासिल की। फिलहाल वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से PhD कर रही हैं। Indian Express की प्रोफाइल के अनुसार, वह JNU की PhD scholar हैं और छात्र राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रही हैं।
उनकी पहचान AISA, यानी CPI(ML) Liberation से जुड़े छात्र संगठन, के नेतृत्व से बनी। छात्र राजनीति में उन्होंने फीस वृद्धि, छात्रवृत्ति और उच्च शिक्षा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर आंदोलनों में हिस्सा लिया है। Indian Express के अनुसार, AISA ने 1990 के दशक से OBC आरक्षण, छात्रवृत्ति, फीस वृद्धि, Occupy UGC और अन्य छात्र आंदोलनों में भूमिका निभाई है।
बीजेपी समर्थक परिवार, लेकिन राजनीतिक रास्ता अलग
नेहा बोरा की व्यक्तिगत कहानी का सबसे चर्चित पहलू उनका पारिवारिक राजनीतिक बैकग्राउंड है।
नेहा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके परिवार में बीजेपी के समर्थक हैं और उनकी राजनीतिक सक्रियता को लेकर घर में लंबे समय से मतभेद रहे हैं। दिल्ली आने और छात्र राजनीति में सक्रिय होने के बाद ये मतभेद और स्पष्ट हुए।
उन्होंने बताया था कि कई बार परिवार में राजनीतिक विचारों को लेकर माहौल तनावपूर्ण भी हुआ, लेकिन अपने जीवन और आर्थिक फैसलों को लेकर उन्हें धीरे-धीरे स्वतंत्रता मिली।
यही विरोधाभास उनकी सार्वजनिक कहानी का एक अहम हिस्सा बन गया है—एक ऐसे परिवार की बेटी, जहां बीजेपी के प्रति समर्थन है, लेकिन खुद उन्होंने CPI(ML) Liberation से जुड़े छात्र संगठन AISA के साथ वामपंथी छात्र राजनीति को चुना।

जंतर-मंतर आंदोलन को लेकर क्या कहती हैं नेहा?
नेहा के लिए जंतर-मंतर का आंदोलन केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं था। उनके मुताबिक, आंदोलन ने युवाओं के बीच एक-दूसरे के साथ खड़े होने और साझा मुद्दों पर एकजुट होने की भावना को मजबूत किया।
उन्होंने Frontline को दिए इंटरव्यू में आंदोलन के दौरान इस्तेमाल हुए राजनीतिक नारों और पोस्टरों का उल्लेख करते हुए मौजूदा सत्ता की विचारधारा पर तीखी राजनीतिक आलोचना की थी।
उनका तर्क था कि युवाओं के सामने केवल सरकार बदलने का सवाल नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अधिकारों को लेकर भी व्यापक सवाल हैं।
इसी संदर्भ में उन्होंने युवाओं के बीच एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होने के बजाय एक-दूसरे के लिए संघर्ष करने की जरूरत पर जोर दिया था।

बीजेपी समर्थक माता-पिता के साथ आंदोलन को लेकर मतभेद
नेहा ने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए यह भी बताया था कि आंदोलन को लेकर उनके घर में राजनीतिक मतभेद हुए। उनके अनुसार, प्रदर्शन के दौरान कुछ बीजेपी समर्थक माता-पिता और बुजुर्ग भी छात्रों के पास आए और आंदोलनकारियों से बातचीत की।
उन्होंने दावा किया था कि उनकी बीजेपी समर्थक मां ने भी पुलिस कार्रवाई को देखने के बाद प्रदर्शनकारियों के प्रयासों को समझा और उनकी सराहना की। यह नेहा के लिए इस बात का उदाहरण था कि राजनीतिक मतभेद के बावजूद किसी मुद्दे पर संवाद संभव है।
हालांकि, ये बातें नेहा के अपने इंटरव्यू में कही गई हैं और इन्हें उनके व्यक्तिगत अनुभव के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

अभिजीत दीपके से तुलना पर नेहा का जवाब
जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर नेहा बोरा की तुलना युवा आंदोलन के दूसरे चर्चित चेहरे अभिजीत दीपके से भी की गई।
एक सोशल मीडिया पोस्ट में दोनों की तुलना करते हुए नेहा को अधिक प्रतिभाशाली और Gen-Z का आइकन बताया गया था। इस पोस्ट को अभिजीत दीपके ने रीपोस्ट करते हुए सहमति जताई।
इसके जवाब में नेहा ने तुलना को खारिज करते हुए “तुलना नहीं, एकजुटता” की बात कही। इसके बाद अभिजीत दीपके ने भी “इंकलाब जिंदाबाद” लिखकर प्रतिक्रिया दी।
यह छोटा-सा सोशल मीडिया संवाद भी उस आंदोलन के भीतर व्यक्तिगत लोकप्रियता के बजाय सामूहिक संघर्ष की उनकी सार्वजनिक छवि को रेखांकित करता है।
अब CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा
नेहा बोरा की सक्रियता अब चुनावी प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों से जुड़े मुद्दे तक पहुंच गई है।
अक्टूबर 2026 में वह दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों में शामिल हुईं। 3 अक्टूबर को पटेल चौक से जंतर-मंतर की ओर मार्च की कोशिश के दौरान नेहा बोरा समेत करीब 150 प्रदर्शनकारियों को पुलिस हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
2 अक्टूबर को भी दिल्ली में CEC के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान नेहा बोरा को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट हुई थी।
इन प्रदर्शनों में SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारी मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां उठा रहे हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने SIR से जुड़े आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया का बचाव किया है।
विरोध से राजनीति तक—नेहा का अगला रास्ता क्या?
नेहा बोरा की कहानी अभी किसी चुनावी राजनीति में प्रवेश की कहानी नहीं है। वह खुद छात्र और जन आंदोलनों की राजनीति को अपनी प्राथमिकता बताती रही हैं। Indian Express को दिए इंटरव्यू में उन्होंने चुनाव लड़ने और छात्र राजनीति के भविष्य जैसे सवालों पर भी बात की थी।
फिलहाल उनकी पहचान एक छात्र नेता और वामपंथी आंदोलन की मुखर आवाज के रूप में तेजी से मजबूत हुई है। शिक्षा और परीक्षा से जुड़े आंदोलनों से लेकर मतदाता अधिकार और चुनाव आयोग से जुड़े विरोध प्रदर्शनों तक उनकी मौजूदगी लगातार दिखाई दे रही है।
यही वजह है कि नेहा बोरा अब केवल JNU या दिल्ली की छात्र राजनीति का नाम नहीं रह गई हैं। हाल के आंदोलनों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है—हालांकि उनकी राजनीति को लेकर समर्थन और विरोध, दोनों मौजूद हैं। उनकी सार्वजनिक भूमिका को समझने के लिए उनके भाषणों के साथ-साथ उनके संगठनात्मक जुड़ाव और उन आंदोलनों के मुद्दों को भी देखना जरूरी है, जिनका वह नेतृत्व या समर्थन कर रही हैं।
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