
सबहेडिंग: कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने न्यायिक हिरासत बढ़ाने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका वापस ली। अदालत ने पहले रिवीजन पिटीशन के वैकल्पिक कानूनी रास्ते का इस्तेमाल करने को कहा। सुनवाई में बैरिकेड पार करने, शांति बनाए रखने के बॉन्ड और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति को लेकर सवाल उठे।
नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिकाएं वापस ले ली हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का कानूनी विकल्प उपलब्ध है, तो याचिकाकर्ताओं ने सीधे हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत याचिका क्यों दायर की।
मामले की सुनवाई जस्टिस सुब्रमोनियम प्रसाद की अदालत में हुई। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों नेताओं की ओर से पहले दिए गए शांति बनाए रखने के बॉन्ड, बैरिकेड पार करने और जंतर-मंतर पर प्रतिबंध के बावजूद पहुंचने से जुड़े पहलुओं पर सवाल उठाए।
दोनों नेताओं की ओर से एडवोकेट अभिक चिमनी ने पक्ष रखा। दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता (CGSC) आशीष दीक्षित पेश हुए।

पहले रिवीजन पिटीशन दाखिल करने की सलाह
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि जब निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने के लिए कानून में रिवीजन पिटीशन का विकल्प मौजूद है, तो सीधे अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करने की जरूरत क्यों पड़ी।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को मौजूदा याचिका वापस लेकर उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने को कहा। इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।
यहां रिवीजन पिटीशन का मतलब निचली अदालत के आदेश की कानूनी समीक्षा के लिए सक्षम अदालत में चुनौती देना है। वहीं, संविधान का अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को मौलिक अधिकारों सहित अन्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है। हालांकि, वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने पर हाईकोर्ट आम तौर पर यह देखता है कि याचिकाकर्ता को पहले उसी उपाय का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं। यह हर मामले की परिस्थितियों और लागू कानून पर निर्भर करता है।
याचिका वापस लेने का अर्थ यह नहीं है कि हिरासत बढ़ाने के आदेश को हाईकोर्ट ने गुण-दोष के आधार पर सही या गलत घोषित कर दिया है।

क्या था पूरा मामला?
10 अक्टूबर को प्रदर्शन से पहले दिल्ली पुलिस ने सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया था। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, दोनों को शांति बनाए रखने की शर्त से जुड़े बॉन्ड के बाद रिहाई मिली थी।
इसके बाद 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थलों की सूची से हटाए जाने की जानकारी सामने आई। 13 अक्टूबर को दोनों नेता तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचे, जहां उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया।
14 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट अदालत ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा। 19 अक्टूबर को हिरासत की अवधि समाप्त होने के बाद उनकी कस्टडी दो दिन के लिए बढ़ा दी गई। इसी आदेश को चुनौती देने के लिए दोनों नेताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया था।

बॉन्ड की शर्तों और बैरिकेड पार करने पर अदालत के सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि यदि दोनों नेताओं ने पहले शांति बनाए रखने का बॉन्ड दिया था, तो उसके बाद दोबारा ऐसे घटनाक्रम में शामिल होने पर प्रशासन की कार्रवाई को किस आधार पर गलत कहा जा रहा है।
अदालत की टिप्पणी का संदर्भ यह था कि यदि बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन की आशंका या तथ्य सामने आते हैं, तो संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई का कानूनी आधार जांचना होगा।
हालांकि, किसी शर्त का उल्लंघन हुआ या नहीं और उसके कानूनी परिणाम क्या होंगे, इसका निर्धारण संबंधित रिकॉर्ड और लागू कानून के आधार पर किया जाना चाहिए।
बैरिकेड पार करने से कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका
अदालत ने प्रदर्शनकारियों के बैरिकेड पार करने के संभावित परिणामों पर भी सवाल उठाए। सुनवाई के विवरण के मुताबिक, अदालत ने कहा कि जब प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार करते हैं, तो उनके साथ दूसरे लोग भी आगे बढ़ सकते हैं। समूह में शामिल कुछ व्यक्तियों की गतिविधियां प्रदर्शन के आयोजकों के नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
अदालत ने इस पहलू को शांति बनाए रखने और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के संदर्भ में उठाया। हालांकि, किसी विशेष प्रदर्शन में हिंसा या अव्यवस्था की आशंका और वास्तविक उल्लंघन के बीच अंतर करना जरूरी है।

‘ये जेन-जी नहीं हैं’: नेताओं की उम्र और संगठन पर सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों याचिकाकर्ताओं की उम्र पूछी। उनके वकील ने बताया कि एक की उम्र 27 वर्ष और दूसरे की 31 वर्ष है। इस पर अदालत ने टिप्पणी की, ‘ये जेन-जी नहीं हैं।’
अदालत ने यह भी पूछा कि दोनों नेता क्या करते हैं और जिस संगठन से जुड़े हैं, उसका उद्देश्य क्या है। यह चर्चा प्रदर्शन के आयोजकों, उनकी भूमिका और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े सवालों के संदर्भ में हुई।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए अनुमति लेने पर जोर
अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रखना था, तो पुलिस से अनुमति लेने का रास्ता क्यों नहीं अपनाया गया। अदालत के मुताबिक, अनुमति और निर्धारित शर्तों के तहत प्रदर्शन आयोजित करने से भीड़ के प्रबंधन तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अधिकार का इस्तेमाल किस स्थान पर, किन शर्तों के तहत और किस प्रक्रिया से किया जा सकता है, यह संबंधित आदेशों और लागू कानून पर निर्भर करता है।
जंतर-मंतर पर रोक के बावजूद पहुंचने पर सवाल
सुनवाई में अदालत ने पूछा कि यदि जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थलों की सूची से हटाया गया था, तो दोनों नेता वहां क्यों पहुंचे। अदालत ने इस संदर्भ में यह भी कहा कि संबंधित अधिसूचना पर रोक लगाए जाने की जानकारी उसके सामने नहीं थी और उससे जुड़े मामले के सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने का उल्लेख किया गया।
अदालत ने बैरिकेड पार करने और अन्य लोगों के भी प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने की आशंका पर सवाल उठाए। यह टिप्पणी सार्वजनिक व्यवस्था और निषेधाज्ञा के पालन से संबंधित थी।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर किसी अधिसूचना की वैधता, उसके दायरे और उस पर अदालतों में चल रही कार्यवाही की स्थिति को संबंधित आदेशों से अलग से सत्यापित करना आवश्यक है।
दोनों मामले क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर
दिल्ली पुलिस ने सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े जंतर-मंतर प्रकरण को क्राइम ब्रांच को स्थानांतरित कर दिया है। इससे पहले कनॉट प्लेस में दर्ज मामले की जांच भी क्राइम ब्रांच को सौंपी गई थी।
अब दोनों मामलों की जांच क्राइम ब्रांच द्वारा किए जाने की जानकारी सामने आई है। जांच में घटनाक्रम, कथित उल्लंघनों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का परीक्षण किया जाएगा।
CJP ने NEET पेपर लीक मामले में किया था लंबा प्रदर्शन
कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जून से 25 जुलाई तक NEET पेपर लीक मामले को लेकर तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, यह प्रदर्शन 36 दिन तक चला था। इस दौरान एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे थे।
20 जुलाई को संगठन ने संसद की ओर मार्च भी किया था। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ चल रहा प्रदर्शन समाप्त कर दिया गया था।
आगे क्या?
सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिकाएं वापस लिए जाने के बाद हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का विकल्प सामने है। इस घटनाक्रम में हाईकोर्ट ने फिलहाल याचिका के जरिए उठाए गए मुद्दों पर अंतिम निर्णय देने के बजाय उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया।
अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों नेता रिवीजन पिटीशन दाखिल करते हैं या नहीं और सक्षम अदालत में उनके तर्कों पर क्या निर्णय होता है।

