छात्राओं के सैनिटरी नैपकिन टेंडर पर घिरे मंत्री गजेन्द्र यादव, किसे फायदा पहुंचाने की तैयारी?

स्व-सहायता समूहों की महिलाओं को मौका नहीं मिलने पर सवाल, निजी कंपनी को ₹42 करोड़ का टेंडर देने की योजना का आरोप

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय क्या मंत्री गजेन्द्र यादव और सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह की भूमिका की जांच कराकर कार्रवाई करेंगे?

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग की निविदा में MSE और स्टार्टअप को टर्नओवर व अनुभव की छूट नहीं; पत्रकार विजया पाठक ने मंत्री गजेन्द्र यादव और सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह की भूमिका पर उठाए सवाल, सरकार से जवाबदेही की मांग

रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने के लिए जारी निविदा अब गंभीर सवालों के घेरे में है। मामला केवल सैनिटरी नैपकिन की खरीद का नहीं, बल्कि सरकारी धन के इस्तेमाल, निविदा में प्रतिस्पर्धा, महिला स्व-सहायता समूहों की भागीदारी और स्कूल शिक्षा विभाग की जवाबदेही का भी है।

पत्रकार विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन ने अपने लेख में आरोप लगाया है कि स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव और विभागीय सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह की भूमिका के चलते निविदा की शर्तें ऐसी बनाई गईं, जिनसे महिला स्व-सहायता समूहों और छोटे उत्पादकों के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है। लेख में एक निजी कंपनी को कथित तौर पर लाभ पहुंचाने और पुराने, एक्सपायर सैनिटरी नैपकिन की आपूर्ति से जुड़े गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं।

इन आरोपों के बीच सार्वजनिक निविदा रिकॉर्ड में कुछ ठोस तथ्य सामने आते हैं। समग्र शिक्षा, छत्तीसगढ़ के लिए सैनिटरी नैपकिन की खरीद की निविदा 25 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुई थी। इसकी बोली जमा करने की अंतिम तारीख 30 सितंबर 2026 थी। निविदा में बोलीदाता का न्यूनतम औसत वार्षिक टर्नओवर 14 करोड़, मूल निर्माता (OEM) का औसत वार्षिक टर्नओवर 90 करोड़ और तीन वर्ष का संबंधित अनुभव निर्धारित था। साथ ही, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (MSE) तथा स्टार्टअप को टर्नओवर और अनुभव के मानदंडों में छूट नहीं दी गई थी।

90 करोड़ का OEM टर्नओवर: आखिर इतनी बड़ी वित्तीय क्षमता क्यों जरूरी?

सार्वजनिक निविदा रिकॉर्ड के अनुसार, मूल निर्माता के लिए पिछले तीन वर्षों का औसत वार्षिक टर्नओवर 90 करोड़ निर्धारित किया गया था। बोलीदाता के लिए न्यूनतम औसत वार्षिक टर्नओवर 14 करोड़ और संबंधित कार्य में तीन वर्ष का अनुभव भी मांगा गया था।

“विजया पाठक के लेख में संबंधित कंपनी के ₹210 करोड़ के वार्षिक कारोबार का उल्लेख किया गया है। वहीं, ऐसे में सवाल है कि पात्रता की यह सीमा किस वित्तीय और तकनीकी आधार पर तय की गई और क्या इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई?”

सवाल यह है कि अगर विजया पाठक के आरोप सहीं साबित होते है तब क्या विभाग ने बाजार में उपलब्ध निर्माताओं की संख्या, उत्पादन क्षमता, आपूर्ति की समयसीमा और प्रतिस्पर्धा पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया था?

यह केवल निविदा की शर्त का सवाल नहीं है। यह जानने का सवाल है कि सरकारी खरीद में पात्रता तय करते समय सार्वजनिक हित और प्रतिस्पर्धा को किस तरह संतुलित किया गया।

महिला स्व-सहायता समूहों के लिए क्या रास्ता छोड़ा गया?

विजया पाठक के लेख का प्रमुख आरोप है कि निविदा की शर्तों के कारण महिला स्व-सहायता समूहों को बाहर होने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है लेख में यह भी कहा गया है कि अन्य राज्यों में छात्राओं के लिए सैनिटरी नैपकिन के निर्माण और वितरण में महिला समूहों को अवसर दिए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में इस पहलू की जांच इसलिए जरूरी है क्योंकि महिला स्व-सहायता समूह केवल छोटे उत्पादक नहीं हैं। ग्रामीण आजीविका और महिला आर्थिक सशक्तीकरण से जुड़ी सरकारी योजनाओं में उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण रही है।

सार्वजनिक टेंडर रिकॉर्ड में MSE के लिए टर्नओवर और अनुभव संबंधी छूट नहीं देने की शर्त दर्ज है।

इससे यह सवाल जरूर उठता है कि छोटे उद्यमों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने कौन-से विकल्प अपनाए।

फिर भी विभाग को यह बताना चाहिए कि क्या महिला समूहों के उत्पादों को सरकारी खरीद में शामिल करने के लिए कोई नीति या वैकल्पिक व्यवस्था विचाराधीन थी। यदि नहीं, तो इसका कारण क्या था?

42 करोड़ का टेंडर या उससे अलग वास्तविक मूल्य?

विजया पाठक के लेख में इस निविदा को लगभग ₹42 करोड़ की प्रक्रिया बताया गया है। लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक टेंडर रिकॉर्ड में अनुमानित निविदा मूल्य प्रकाशित नहीं है।

सार्वजनिक रिकॉर्ड में कुल 8,70,65,040 सैनिटरी नैपकिन की मात्रा दर्ज है। निविदा में दो मदों के तहत क्रमशः 4,26,11,200 और 4,44,53,840 इकाइयों का उल्लेख है।

इतनी बड़ी मात्रा की खरीद में प्रति इकाई कीमत, उत्पाद की गुणवत्ता, आपूर्ति की समयसीमा और वितरण की व्यवस्था का महत्व बढ़ जाता है। यदि अनुमानित लागत सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट नहीं है, तो विभाग को कुल वित्तीय अनुमान, प्रति इकाई लागत का आधार और बजट प्रावधान स्पष्ट करना चाहिए।

यह भी जरूरी है कि निविदा की मात्रा, अनुमानित मूल्य और अंतिम स्वीकृत अनुबंध राशि को अलग-अलग समझा जाए। इन तीनों को एक ही आंकड़ा मानने से सार्वजनिक खर्च की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट नहीं होगी।

180 दिन की शर्त: बोली की वैधता और डिमांड ड्राफ्ट में अंतर

विजया पाठक के लेख में दावा किया गया है कि सुरक्षा निधि से संबंधित शर्त में 180 दिन की अवधि मांगी गई थी, जबकि इससे छोटी अवधि वाले वित्तीय दस्तावेजों के कारण कुछ कंपनियों को परेशानी हुई।

लेकिन सार्वजनिक टेंडर रिकॉर्ड में 180 दिन की अवधि को बोली की वैधता (Bid Validity) के रूप में दर्ज किया गया है। इसे डिमांड ड्राफ्ट की वैधता मान लेना सही नहीं होगा।

इसलिए विभाग से यह स्पष्ट होना चाहिए कि मूल निविदा में EMD, बैंक दस्तावेजों और बोली की वैधता के लिए अलग-अलग क्या शर्तें थीं। यदि किसी बोलीदाता ने किसी शर्त के कारण आपत्ति दर्ज की थी, तो उस पर विभाग ने क्या निर्णय लिया?

50 लाख की EMD और छोटे उद्यमों पर उसका असर

निविदा में 50 लाख की अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट (EMD) निर्धारित थी। सार्वजनिक रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि MSE और स्टार्टअप को टर्नओवर तथा अनुभव की शर्तों में छूट नहीं दी गई थी।

EMD का उद्देश्य बोली प्रक्रिया में गंभीरता सुनिश्चित करना और निर्धारित शर्तों के अनुसार बोलीदाता की प्रतिबद्धता बनाए रखना होता है। लेकिन इतनी बड़ी जमा राशि छोटे उत्पादकों की भागीदारी पर कितना असर डाल सकती है, यह भी जांच का विषय है।

विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि EMD और वित्तीय पात्रता की शर्तें निर्धारित करते समय कितने संभावित आपूर्तिकर्ताओं के बाजार का आकलन किया गया था। क्या पर्याप्त संख्या में कंपनियां इन शर्तों को पूरा कर सकती थीं? कितनी कंपनियों ने वास्तव में बोली जमा की? कितनी तकनीकी रूप से पात्र पाई गईं?

इन सवालों के जवाब से पता चलेगा कि निविदा में प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त अवसर था या नहीं।

एक्सपायर सैनिटरी नैपकिन की आपूर्ति का आरोप कितना गंभीर है?

विजया पाठक के लेख में आरोप लगाया गया है कि संबंधित कंपनी से लगभग ₹450 करोड़ मूल्य के पुराने और एक्सपायर सैनिटरी नैपकिन की आपूर्ति कराए जाने की योजना थी। लेख में लगभग ₹100 करोड़ की कथित आर्थिक अनियमितता का भी उल्लेख किया गया है।

यह आरोप छात्राओं के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा है, इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसलिए इस आरोप की वास्तविकता जानने के लिए विभाग से कुछ सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए:

– क्या किसी कंपनी के पुराने या एक्सपायर सैनिटरी नैपकिन के स्टॉक से संबंधित कोई प्रस्ताव विभाग के सामने आया था?
– क्या किसी पुराने स्टॉक को नई आपूर्ति के रूप में वितरित करने का निर्देश जारी हुआ?
– क्या विभाग के पास उत्पादों की गुणवत्ता, बैच और एक्सपायरी तारीख से संबंधित निरीक्षण रिपोर्ट है?
– क्या इस मामले में कोई शिकायत प्राप्त हुई और यदि हां, तो उस पर क्या कार्रवाई की गई?

यदि एक्सपायर उत्पादों की आपूर्ति का कोई दस्तावेजी प्रमाण मिलता है, तो यह गुणवत्ता नियंत्रण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से गंभीर मामला होगा। छात्राओं को दिए जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।

मंत्री गजेन्द्र यादव और सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह से जवाबदेही के सवाल

विजया पाठक के लेख में स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव और विभागीय सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह पर आरोप लगाया गया है कि निविदा की शर्तों में ऐसे बदलाव किए गए, जिनसे महिला समूहों की भागीदारी प्रभावित हुई और किसी विशेष निजी कंपनी को लाभ मिल सकता था।

इन आरोपों के संदर्भ में विभागीय निर्णय प्रक्रिया की जानकारी सामने आना जरूरी है। निविदा किस अधिकारी ने तैयार की? पात्रता की वित्तीय सीमा किस आधार पर निर्धारित की गई? क्या प्रस्ताव में बदलाव किए गए? क्या इन बदलावों का लिखित अनुमोदन मौजूद है? और क्या विभाग ने संभावित आपूर्तिकर्ताओं की प्रतिस्पर्धा पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया?

सरकारी पद सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़ा है। इसलिए मंत्री और अधिकारियों को यह बताना चाहिए कि निर्णय क्यों लिया गया, उसका आधार क्या था और उससे जनता को क्या लाभ मिला।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से क्या अपेक्षा है?

विजया पाठक ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मामले में हस्तक्षेप करने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।

मुख्यमंत्री के सामने इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या निविदा की प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और छात्राओं के हितों को पर्याप्त महत्व दिया गया।

यदि पात्रता की शर्तों के कारण छोटे उत्पादकों और महिला समूहों की भागीदारी सीमित हुई है, तो सरकार को उसका औचित्य स्पष्ट करना चाहिए। यदि किसी नियम का उल्लंघन हुआ है या किसी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के प्रमाण सामने आते हैं, तो संबंधित प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

सरकार के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन की आपूर्ति प्रभावित न हो। निविदा संबंधी विवाद के बीच गुणवत्ता और समयबद्ध वितरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी विभाग की है।

इस रिपोर्ट को तैयार करते समय मंत्री गजेन्द्र यादव, सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह और मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से इन विशिष्ट आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सत्यापित नहीं हो सकी है। इसलिए सरकार की ओर से जांच या कार्रवाई का निर्णय हो चुका है, ऐसा दावा नहीं किया जा रहा है।

छात्राओं के स्वास्थ्य और सरकारी खरीद की पारदर्शिता पर समझौता नहीं

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग की सैनिटरी नैपकिन निविदा ने वित्तीय पात्रता, छोटे उत्पादकों की भागीदारी और सरकारी खरीद की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। सार्वजनिक रिकॉर्ड में 14 करोड़ का बोलीदाता टर्नओवर, 90 करोड़ का OEM टर्नओवर, ₹50 लाख की EMD और MSE तथा स्टार्टअप को टर्नओवर एवं अनुभव संबंधी छूट नहीं देने की शर्त दर्ज है।

इन शर्तों का औचित्य विभाग को स्पष्ट करना चाहिए। साथ ही, एक्सपायर उत्पादों की कथित आपूर्ति और किसी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोपों की जांच दस्तावेजों के आधार पर होनी चाहिए।

छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराना सरकार की सार्वजनिक जिम्मेदारी है। महिला स्व-सहायता समूहों की भागीदारी, निविदा में प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक धन के उचित इस्तेमाल से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जवाब मिलने चाहिए।


Nagendra sahu
Nagendra sahu
नागेन्द्र साहू छत्तीसगढ़ के भिलाई से हैं। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक (BJMC) और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (MJ) की शिक्षा प्राप्त की है। पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वीडियो एडिटिंग ( Ex- भिलाई Times Sr Editor ) और डिजिटल कंटेंट में भी विशेषज्ञता के साथ वर्तमान में रेखांकित न्यूज़ का संचालन कर रहे हैं।
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