2026 का मेडिसिन नोबेल: रोशनी से दिमाग की नसों को कंट्रोल करने की तकनीक ने बदली न्यूरोसाइंस, जर्मनी-अमेरिका के 3 वैज्ञानिकों को सम्मान

2026 मेडिसिन नोबेल विजेता पीटर हेगेमैन, जॉर्ज नागेल और कार्ल डाइसेरोथ की ऑप्टोजेनेटिक्स रिसर्च
रोशनी की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित करने वाली ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक के लिए तीन वैज्ञानिकों को 2026 का मेडिसिन नोबेल दिया गया।

पीटर हेगेमैन, जॉर्ज नागेल और कार्ल डाइसेरोथ को ऑप्टोजेनेटिक्स के लिए नोबेल; इस तकनीक से वैज्ञानिक यह समझ पा रहे हैं कि दिमाग की खास कोशिकाएं याददाश्त, भावनाओं और व्यवहार को कैसे नियंत्रित करती हैं

स्टॉकहोम, 8 अक्टूबर 2026। 2026 का नोबेल पुरस्कार फिजियोलॉजी या मेडिसिन के क्षेत्र में जर्मनी के वैज्ञानिक पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल तथा अमेरिका के वैज्ञानिक कार्ल डाइसेरोथ को दिया गया है। तीनों वैज्ञानिकों को लाइट-गेटेड आयन चैनल और ऑप्टोजेनेटिक्स के विकास में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। ऑप्टोजेनेटिक्स ऐसी तकनीक है, जिसमें प्रकाश और आनुवंशिक बदलाव की मदद से दिमाग की खास तंत्रिका कोशिकाओं यानी न्यूरॉन्स की गतिविधि को नियंत्रित किया जा सकता है।

इस खोज ने न्यूरोसाइंस में एक बड़ा बदलाव किया है। पहले वैज्ञानिक यह तो देख सकते थे कि दिमाग के किसी हिस्से में गतिविधि बढ़ रही है या घट रही है, लेकिन किसी खास प्रकार की तंत्रिका कोशिका को अलग से सक्रिय या निष्क्रिय करके यह साबित करना मुश्किल था कि वह कोशिका किसी खास व्यवहार या मानसिक प्रक्रिया के लिए वास्तव में जिम्मेदार है। ऑप्टोजेनेटिक्स ने इस समस्या का एक नया रास्ता दिया। इसकी मदद से वैज्ञानिक चुनी हुई कोशिकाओं को बहुत सटीक समय पर सक्रिय या शांत कर सकते हैं और फिर देख सकते हैं कि इससे जानवर के व्यवहार या दिमाग की गतिविधि में क्या बदलाव आता है।

कहानी शुरू हुई एक छोटे से शैवाल से

इस पूरी तकनीक की शुरुआत मानव मस्तिष्क से नहीं, बल्कि एक छोटे से एककोशिकीय हरे शैवाल क्लैमाइडोमोनास रिइनहार्ड्टी (Chlamydomonas reinhardtii) से हुई। यह शैवाल प्रकाश की दिशा में तैर सकता है। पीटर हेगेमैन यह समझना चाहते थे कि यह जीव प्रकाश को पहचानता कैसे है और उसके अनुसार अपनी गति कैसे बदलता है।

रिसर्च के दौरान हेगेमैन और उनके सहयोगियों ने ऐसे प्रोटीनों की पहचान की जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील थे। जॉर्ज नागेल के साथ किए गए प्रयोगों में चैनलरोडॉप्सिन-1 और चैनलरोडॉप्सिन-2 (ChR1 और ChR2) की भूमिका सामने आई। 2002 और 2003 में प्रकाशित अध्ययनों में दिखाया गया कि ये प्रोटीन प्रकाश से नियंत्रित आयन चैनल की तरह काम कर सकते हैं। खास तौर पर ChR2 पर हुए प्रयोगों में यह साबित हुआ कि नीली रोशनी पड़ने पर चैनल खुल सकता है और आयनों को कोशिका की झिल्ली के पार जाने देता है, जिससे विद्युत गतिविधि पैदा होती है।

यही खोज आगे चलकर ऑप्टोजेनेटिक्स की बुनियाद बनी। वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि यदि इस तरह के प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन को किसी दूसरी कोशिका में बनाया जा सके, तो उस कोशिका की गतिविधि को बाहर से प्रकाश डालकर नियंत्रित किया जा सकता है।

शैवाल का प्रोटीन बना न्यूरॉन्स का ‘ऑप्टिकल स्विच’

अगला बड़ा कदम अमेरिकी वैज्ञानिक कार्ल डाइसेरोथ और उनके सहयोगियों ने उठाया। उन्होंने चैनलरोडॉप्सिन जैसे प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन को न्यूरॉन्स में इस्तेमाल करने का तरीका विकसित किया। इसके लिए आनुवंशिक तकनीक से न्यूरॉन्स में ऐसा जीन पहुंचाया गया, जिससे वे प्रकाश-संवेदनशील चैनल बनाने लगें।

अब अगर इन न्यूरॉन्स पर उचित तरंगदैर्ध्य की रोशनी डाली जाए, तो चैनल खुलता है और न्यूरॉन की विद्युत गतिविधि को नियंत्रित किया जा सकता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी सेल-टाइप स्पेसिफिसिटी और मिलीसेकंड स्तर की टाइमिंग है। यानी वैज्ञानिक चुनिंदा न्यूरॉन्स को बेहद सटीक समय पर सक्रिय कर सकते हैं।

2005 में डाइसेरोथ की टीम ने इस तकनीक के जरिए न्यूरॉन्स की गतिविधि को प्रकाश से नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण प्रदर्शन किया। इसके बाद 2007 में उनके समूह ने जीवित जानवरों में ऑप्टिकल न्यूरल इंटरफेस के जरिए मस्तिष्क की गतिविधि और व्यवहार को नियंत्रित करने की क्षमता दिखाई। इन प्रयोगों ने ऑप्टोजेनेटिक्स को एक प्रयोगशाला तकनीक से आगे बढ़ाकर न्यूरोसाइंस के लिए एक शक्तिशाली शोध उपकरण बना दिया।

इससे याददाश्त और भावनाओं को समझने में क्या मदद मिली?

दिमाग में अरबों तंत्रिका कोशिकाएं हैं और वे बेहद जटिल नेटवर्क के रूप में एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं। किसी व्यवहार के दौरान कई अलग-अलग न्यूरॉन्स एक साथ सक्रिय हो सकते हैं। ऐसे में यह पता लगाना कठिन होता है कि इनमें से कौन-सी कोशिका वास्तव में उस व्यवहार को पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

ऑप्टोजेनेटिक्स ने वैज्ञानिकों को इस सवाल का अधिक सीधे तरीके से परीक्षण करने का मौका दिया। किसी खास प्रकार के न्यूरॉन्स को प्रकाश से सक्रिय या निष्क्रिय करके वैज्ञानिक देख सकते हैं कि उसके बाद जानवर की गतिविधि, नींद, डर, पुरस्कार की प्रतिक्रिया, सीखने या दूसरे व्यवहारों में क्या बदलाव आता है।

इसी वजह से इस तकनीक का इस्तेमाल याददाश्त, भावनाओं, व्यवहार, नींद और अलग-अलग न्यूरल सर्किट को समझने के लिए किया जाने लगा। नोबेल कमेटी और करोलिंस्का इंस्टीट्यूट के मुताबिक, इस काम ने यह समझने में मदद की कि जीवित मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाएं किस तरह यादों, भावनाओं और व्यवहार को आकार देती हैं।

डिप्रेशन और मानसिक बीमारियों की रिसर्च में क्यों महत्वपूर्ण है?

ऑप्टोजेनेटिक्स ने मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों को समझने के लिए भी नए प्रयोगों का रास्ता खोला है। डिप्रेशन, स्किजोफ्रेनिया, पार्किंसंस, मिर्गी और दूसरी बीमारियों में दिमाग के अलग-अलग न्यूरल सर्किट की भूमिका समझने के लिए वैज्ञानिक इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यह जांचना संभव होता है कि किसी खास न्यूरल सर्किट को बदलने पर बीमारी से जुड़े व्यवहार या लक्षणों में क्या असर पड़ता है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों का इलाज अब सीधे रोशनी डालकर किया जा सकता है। मनुष्यों में ऑप्टोजेनेटिक्स का चिकित्सकीय इस्तेमाल अभी शुरुआती और शोध के चरण में है। फिलहाल इसका सबसे बड़ा प्रभाव बुनियादी न्यूरोसाइंस और बीमारी के जैविक तंत्र को समझने में है।

आंखों की रोशनी वापस लाने की दिशा में भी इस्तेमाल

ऑप्टोजेनेटिक्स का एक महत्वपूर्ण संभावित चिकित्सकीय इस्तेमाल दृष्टि बहाल करने में भी सामने आया है। वैज्ञानिक ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं जिनमें प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन बनाने के लिए आनुवंशिक निर्देश आंखों की कुछ कोशिकाओं तक पहुंचाए जाते हैं। इसके बाद बाहरी प्रकाश संकेतों की मदद से ऐसी कोशिकाओं को सक्रिय करने की कोशिश की जाती है, जो बीमारी के बावजूद अपेक्षाकृत सुरक्षित बची रहती हैं।

रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा जैसी गंभीर आनुवंशिक बीमारियों में इस दिशा में शुरुआती मानव परीक्षणों से कुछ मरीजों में सीमित दृष्टि-सुधार के संकेत मिले हैं। हालांकि अभी यह सामान्य दृष्टि बहाल करने वाली तकनीक नहीं है और इसके विकास पर लगातार शोध चल रहा है।

20 साल में बदली दिमाग की रिसर्च

ऑप्टोजेनेटिक्स की खासियत यह है कि यह केवल दिमाग को देखने की तकनीक नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों को कारण और प्रभाव का परीक्षण करने का मौका देती है। किसी खास न्यूरॉन को सक्रिय करने के बाद व्यवहार बदलता है तो शोधकर्ता उसके और उस व्यवहार के बीच संबंध को अधिक मजबूती से जांच सकते हैं।

इसी वजह से पिछले करीब दो दशकों में ऑप्टोजेनेटिक्स न्यूरोसाइंस की सबसे प्रभावशाली तकनीकों में शामिल हो गई है। 2026 का मेडिसिन नोबेल इस पूरे वैज्ञानिक सफर को मान्यता देता है—एक ऐसे छोटे शैवाल से शुरू हुई खोज, जिसने वैज्ञानिकों को जीवित दिमाग की खास कोशिकाओं को रोशनी के जरिए नियंत्रित करने का तरीका दिया।


Nagendra sahu
Nagendra sahu
नागेन्द्र साहू छत्तीसगढ़ के भिलाई से हैं। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक (BJMC) और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (MJ) की शिक्षा प्राप्त की है। पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वीडियो एडिटिंग ( Ex- भिलाई Times Sr Editor ) और डिजिटल कंटेंट में भी विशेषज्ञता के साथ वर्तमान में रेखांकित न्यूज़ का संचालन कर रहे हैं।
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